दिल से देश सेवा ही देशभक्ति और मस्तिष्क के मंथन से बना विचारधारा

 राजनीतिक छवि चमकाने में देश कहीं अपने महापुरुषों स लेकर देश तक का अपमान तो नहीं कर रहा। आज जिस विचारों को जबरदस्ती जनता के बीच कुछ लोगों केेे द्वारा थोपने की कोशिश की जा रही शायद वह एक अलग आकार ले चुका है। जो जनता अपनी जरूरतो को भूल कर घर मेंं रोटी नमक की चिंता किए बिना बस एक मझधार में बहने के लिए विवश हो चुकी है।  उसे यह डर सताने लगा हैै कि कोई उसे देशद्रोही ना बता दे। यही नहीं बल्कि उसे एक सर्टिफिकेट की भी आवश्यकता आगे ना पड़ने लगे।

शायद इसी डर का शासन सत्ता परिपूर्णण लाभ भी उठा रहा है। लेकिन विचारणीय बात है कि अगर आप किसी विचार सेेे अपनेे को संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं तो आप उस विचार को जबरदस्ती कैसे अपना सकते हैं ? मन मस्तिष्क के उत्तल पुथल और मंथन  से जो निष्कर्ष निकला वह आपका विचार बन गया है। फिर देश में जो वर्तमान समय में हो रहा वह कितना जायज है? मतलब मन मंथन से उत्पन्न स्थिति आप की विचारधारा है वह किसी दूसरे के विचार से कैसे सामंजस्य बना सकता है सोचिए।

फिर देश में पिछले कुछ समय से एक विचार पंथ को मानने वाले देशभक्त और दूसरे विचार पंथ को मानने वाले देश के गद्दार कैसे चुकी विचार से देशभक्ति सिद्ध नहीं हो सकती देशभक्ति दिल में उठे देश सेवा देश प्रेम से होती है जिसका कोई आज तक मानक भी तो नहीं यदि किसी को अपने काम से एक घंटे का समय मिला तो वह अपनी उस 1 घंटे में देश के प्रति देश प्रेम देश सेवा अपनी आस्था सोच सकता है और उसके द्वारा पूरे दिन किए गए कार्य से भी तो देश सेवा अंशदान हो रहा है। फिर केवल देश के प्रति अच्छी बात बता देने वाला देश भक्त और उसी विचार में सभी चलें यह कैसा पैमाना है देश की जनता को जिस वक्त और जब समय मिले तब ईमानदारी निष्ठा देश सेवा कर देश के प्रति समर्पित दिखे यही सच्ची देशभक्ति है।


दिल के समर्पण को आप जबरदस्ती सिद्ध करने का प्रयास नहीं करवा सकते हैं। विचारधारा मस्तिष्क की उपज है घोर मंथन पर एक लकीर खींची जाती है जिसको हटाया नहीं जा सकता। देशभक्ति तो हर इंसान की अपनी श्रद्धा है ना कि एक विचारधारा थोप कर करवाई जा सकती है। सुबह शाम देशभक्ति सिद्ध करने का जो ड्रामा देश में पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है उससे सामाजिक अस्थिरता ही आगे आने वाले समय में दिख सकता है ना कि भाईचारा। कुछ समय से विरोध करने के तरीके पर सवाल उठने लगा इससे पहले भी जेपी आंदोलन अन्ना आंदोलन जैसे विरोध से देश गुजर चुका है। लेकिन उस समय आखिर देशभक्ति दिखाने की जरूरत नहीं पड़ी लेकिन आज ऐसा क्या हो गया जो देश भक्ति की सर्टिफिकेट पाना अति आवश्यक हो गया है।

लोकतंत्र में जो जनता अपने मताधिकार का प्रयोग कर देश में अपना प्रधान चुनती है वह प्रत्येक प्रधान से सहमति और असहमति दोनों दर्ज कर सकते है ऐसी स्थिति में तो उसका विरोध भी तो जनता कर सकती है इसके लिए अलग से कानून बनेगा क्या तो फिर संविधान पर ही सवालिया निशान उठाया जा रहा है सोचने वाले विषय बनते जा रहा है। जनता आपसे सहमत नहीं तो आप उसे देशद्रोही बता देंगे और नहीं तो काले कानून के तहत जेल में डलवा देंगे ऐसा भला एक लोकतंत्रात्मक देश में कैसे हो सकता है इस पर सभी को ध्यान देने की जरूरत है। देश जनता से और उसकी सहमति असहमति दोनों जाहिर करने का पूर्ण अधिकार देता है।

यही हमारा संविधान इसकी गारंटी भी देश की जनता को देता है। मतलब मस्तिष्क के मंथन से विचार और दिल के प्रेम से उठा देश सेवा ही देश प्रेम है। जिस पर कोई भी देशवासी उंगली उठते देख नहीं सकता और इसमें किसी से सर्टिफिकेट लेने की तो आवश्यकता बिल्कुल भी नहीं।

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