!!प्रकृति की चेतावनी !!

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यह जो बदल गरज़ रहे है,
संकेत दे रहे है,
कह रही प्रकृति हम सबसे गर तुम मुझ पर गोले
बरसाओगे,
छिन्न भिन्न हो जाओगे,
पलट दूंगी सारी विधा को,
बढ़ायी जो मेरी दुविधा को,
मैं शांत रूप तो मत समझो मुझको अनूप,
मैं क्रोध अंदर पालती अग्नि सहित संभालती,
मैं समर समंदर की देवी,
समूल पर्वत मुझ पर बेदी,
हे मानव वक्त रहते संभल जाओ,
और क्रोध की अग्नि में मुझे मत जलाओ!!

मेरे जज़्बात की स्याही से – र!V

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