स्वतंत्र प्रभात-सुबह से लेकर शाम तक थानों में जमे रहते हैं दलाल...पहले दलालों के हाथ में पहुंचती है तहरीर...

 

पहले दलालों के हाथ में पहुंचती है तहरीर...

ज्ञान प्रकाश चतुर्वेदी/सोनभद्र:

रॉबर्ट्सगंज कोतवाली में दलालों का बोलबाला है। सुबह होते ही दलाल थाने में डेरा जमा लेते हैं, और देर रात को ही थाने से घर जाते हैं।

पीड़ित की तहरीर पुलिस से पहले दलालों के हाथ में पहुंचती है, उसके बाद दलाल संतुष्ट हुआ तो तहरीर पर कार्रवाई की जाती है। सरकार की छवि धूमिल कर रहे दलालों और उनको संरक्षण दे रहे।


थाने में तैनात कुछ पुलिसकर्मियों से मधुर संबंधों के चलते वह मनचाहे फैसले कराता रहता है। थाने के गेट पर रखा रहने वाला आगंतुक रजिस्टर तो जैसे मजाक बनकर रह गया है। पूरे दिन थाने में जमे रहने के बावजूद रजिस्टर में दलालों के नाम की एंट्री नहीं की जाती है।

कोतवाली जाने वाले पीड़ितों के नाम भी जरूरी होने पर ही रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं, जबकि एसपी के आदेश हैं कि थाने आने वाले हर व्यक्ति का नाम रजिस्टर में दर्ज किया जाना चाहिए।

बताते कि जनपद में लूट, छिनैती, जमीनों पर कब्जा सहित अन्य अपराधिक घटनायें आये दिन हो रही है और पुलिस उस पर अंकुश लगाने में नाकामयाब साबित हो रही है। कई कई बड़ी घटनाओं का खुलासा भी नहीं हो सका है।


थानों में दलालों का बोलबाला और राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़ गया है। सवेरे से थानों में दलालों का जमघट लग रहा है, इससे यही प्रतीत हो रहा है कि पुलिस कम दलाल ज्यादा सक्रिय है। जनपद का प्रत्येक थाना और चैकियां चलाने में दलालों की भूमिका दिखाई दे रही है।

जबकि पीडि़तों का थाना परिसरों में थानाध्यक्ष से सीधे मिलने के बजाय दलालों का सहारा लेना पड़ रहा है। इन दलालों के हौसले इतने बुलन्द है कि चाहे जैसा भी काम हो उनके लिए संभव हो जाता है जबकि मामूली काम के लिए भी लोगों को दर्जनों चक्कर थाने का लगाना पड़ता है।

ये दलाल चाहे आम इन्सान के रूप में हो अथवा राजनैतिक दल के विशेषकर सत्ताधरी दल के लोग इसमें अधिक होते है। दलालों के माध्यम से झगड़ा - फसाद का निपटारा कराने में भी इनकी अहम् भूमिका होती है।

सुविधा शुल्क के जोर से बड़े मामले भी चन्द मिनट में समाप्त कर दिये जाते है। अग यही खेल प्रत्येक थाने में चलता रहा तो पीडि़तों को न्यायालय नहीं बल्कि दलालों की शरण में जाना पसन्द करेगें। थानों में जिसकी लाठी उसकी भैस वाली तर्ज पर फैसला किया जाता है।

यदि पुलिस कप्तान ने इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तो बेकसूर जेलों की हवा खायेगें और खाकी पर प्रश्न चिन्ह लगता रहेगा।

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