स्वतंत्र प्रभात-2014 के रोजगार देने के नारे को क्या फिर 2019 में दोहरा पायेगी मोदी सरकार ?

 

आने वाले 2019 के चुनावों में युवाओं की संख्या 13 करोड़ के पार है। ऐसे में श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के हिसाब से नए रोज़गार पैदा होने में 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 
नई दिल्ली : मोदी सरकार की नीतियों पर लगातार हमले कर रहे बीजेपी के नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि साल 2019 में मोदी सरकार के सामने रोजगार सबसे बड़ी समस्या होगी। अब बेरोजगारी के इसी सवाल को विपक्ष में चुनावों में अपना हथियार बनाता जा रहा है। रोजगार का सवाल सरकार के सामने इस लिए भी बड़ा हो गया है क्योंकि साल 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी ने आगरा की चुनावी रैली में कहा था कि उनकी सरकार हर साल 2 करोड़ रोजगार देगी।

2019 में 13 लाख युवा नए वोटर 

साल 2014 के चुनावों में बीजेपी को वोट देने वालों बड़ी तादात में युवा वर्ग था। चुनाव आयोग के आंकड़ों की माने तो साल 2014 में 15 करोड़ युवाओ ने पहली बार वोट दिया। जबकि आने वाले 2019 में ऐसे युवाओं की संख्या 13 करोड़ के पार है। 

मोदी सरकार के तीन साल के रोजगार के आंकड़ों पर नजर डालें तो रोजगार के मौकों में 60 प्रतिशत की गिरावट आयी है। स्टेट बैंक के 'इको फ़्लैश' के सर्वेक्षण में कहा गया है कि अगस्त 2016 में बेरोज़गारी की दर 9.5 प्रतिशत थी, जो फरवरी 2017 में घटकर 4.8 प्रतिशत हो गई। भारत सरकार के ही श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के हिसाब से नए रोज़गार पैदा होने में 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 
आर्थिक मोर्चे पर लोगों में मोदी सरकार को लेकर निराशा 

आरबीआई का ताज़ा कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे कहता है कि पिछले चार तिमाहियों से आम उपभोक्ताओं में आम आर्थिक हालात को लेकर निराशा का भाव है। सर्वे में कहा गया है कि सितंबर 2017 तक आम आर्थिक स्थिति के बारे में 34.6 प्रतिशत जवाबदाताओं ने कहा कि स्थिति “सुधरी” है, जबकि सितंबर 2016 तक ऐसा मानने वालों की जवाबदाता 44.6 प्रतिशत थी। सर्वे के अनुसार सितंबर 2017 तक 40.7 प्रतिशत जवाब देने वालों ने कहा कि आर्थिक स्थिति “बिगड़ी” है, जबकि सितंबर 2016 तक 25.3 प्रतिशत जवाब देने वाले ही ऐसा मानते थे।

मोदी सरकार ने कितने रोजगार दिए 

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट की माने तो पिछले 30 सालों में भारत में सिर्फ 70 लाख नए रोज़गार ही आए, जबकि ज़रूरत ढाई करोड़ नई नौकरियों की थी। लेबर मिनिस्ट्री के आंकड़ों की माने तो साल 2014 में जान कुल 4.21  लाख नौकरियां मिली वहीँ इसकी संख्या में साल 2015-16 में जोरदार गिरावट देखी गई। 2015 में कुल 1.35 लाख रोजगार मिले, तो साल 2016 में भी महज 1.35 लाख रोजगार मिले।
हालाँकि केंद्र सरकार श्रम सचिव रह चुके प्रभात चंद्र चतुर्वेदी रोजगार के इन आंकड़ों के इत्तेफाक नहीं रखते हैं हैं। उनका कहना है कि ''लेबर मिनिस्ट्री के लिए रोजगार के एकदम सही आंकड़े इकठ्ठा करना बेहद मुश्किल काम हैं। लेबर मिनिस्ट्री रोजगार के जो आंकड़े पेश करती है वो त्वरित आंकड़े होते हैं।''
कई राज्य सरकारों के साथ काम कर चुके पूर्व आईएएस अफसर चतुर्वेदी का कहना है कि ''सरकार ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधार के जो बड़े कदम उठाये हैं, उससे वर्तमान में रोजगार पर भले असर जरूर पड़ा है लेकिन आने वाले समय में इन क़दमों से सरकार के रेवेन्यू जोरदार इजाफा होगा और सरकार सोशल स्कीम्स और इंफ्रास्ट्रक्टर के जरिये रोजगार उपलब्ध करा पायेगी''।    

सरकार के स्किल डेवलपमेंट स्‍कीम पर सवाल

जॉब के नए मौके नहीं बनने से मोदी सरकार की स्किल डेवलपमेंट स्‍कीम पर सवाल उठने लगे हैं। स्किल डेवलपमेंट स्‍कीम के सहारे देश में नौकरियों की बड़े मौके बनने की उम्‍मीद थी। लेकिन, बीते 3 साल में 30 लाख से अधिक नौजवानों को इस स्‍कीम के तहत ट्रेनिंग मिली लेकिन अभी तक तीन लाख लोगों को भी जॉब नहीं मिल पाई है। इस स्‍कीम के तहत 2016-20 के लिए सरकार ने 12,000 करोड़ का बजट अलॉट किया। इसका फायदा 1 करोड़ युवाओं तक पहुंचाना है।

आर्थिक पत्रकार एमके वेणु लिखते हैं कि ''कपड़ा, धातु, चमड़े, रत्न एवं आभूषण, आईटी एवं बीपीओ, ट्रांसपोर्ट, ऑटोमोबाइल्स और हतकरघा जैसे संगठित क्षेत्रों में रोज़गार निर्माण में तेज गिरावट आयी है। सवाल यह है कि आखिर इन क्षेत्रों में गड़बड़ी कहां हो रही है, जबकि माना यह जाता है कि वैश्विक स्तर पर भारत को इन क्षेत्रों में बढ़त हासिल है। 2015 में इन आठ क्षेत्रों में नए रोज़गार का निर्माण गिरकर अब तक के सबसे निचले स्तर, 1.5 लाख पर आ गया. इसे खतरे की घंटी समझकर सरकार ने आंकड़े इकट्ठा करने के तरीके की समीक्षा करने का फैसला लिया''। 

नोटबंदी के बाद घटा रोजगार 

यूपीए के दौर में विकास दर 8.5 थी वहीँ नोटबंदी के बाद वर्तमान में यह 5.7 पर आ चुकी है। नोटबंदी के बाद  रोजगार में भी बड़ी गिरावट आयी है। सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि नोटबंदी के बाद मनरेगा में काम मांगने वालों की संख्या में 30 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

16 राज्यो की रिपोर्ट बताती है मनरेगा बजट बढते बढते चाहे 48 हजार करोड पार कर गया लेकिन रोजगार पाने वालो की तादाद में 7 लाख परिवारो की कमी आ गई । क्योंकि केंद्रीय ग्रामीण  विकास मंत्रालय की ही रिपोर्ट कहती है  कि 2013-14 में  पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी,। जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई ।

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार अक्टूबर 2016 से लेकर जनवरी 2017 के बीच कुल 1.52 लाख अस्थायी नौकरियां और 46,000 पार्ट टाइम नौकरियां ख़त्म हो गईं। 

स्टार्टअप हो रहे हैं बंद 

आंकड़ों की माने तो 2016 में 212 स्टार्टअप्स बंद हो गए। यह पिछले साल की तुलना में 50 फ़ीसदी अधिक है 2017 में भी यह ट्रेंड बना रहा। 2017 के पहले नौ महीने में केवल 800 नए स्टार्टअप्स बाज़ार में उतरे. जबकि 2016 के दौरान इनकी कुल संख्या 6,000 थी। स्टार्टअप्स ने 2016 के 4.6 बिलियन डॉलर की तुलना में 2017 के पहले नौ महीने में 8 बिलियन डॉलर इकट्ठा किए हैं. वहीं 2016 के 1000 की तुलना में इसकी मात्रा 2017 में केवल 700 ही है। 

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