स्वतंत्र प्रभात-माता पिता का बेटियों के प्रति एक मात्र लक्ष्य उनकी शादी करना क्यों होता है?

 

सोनभद्र :- सिर्फ़ हमारे समाज में ही नहि पूरे देश में लड़कियों को सिर्फ़ शादी को केंद्र में रख कर बड़ा किया जाता है । दिक़्क़तें तभी से होने लगती हैं जब आप बेटी पर सारी मेहनत उसे 'मैरिज मटेरियल' बनाने के लिए करने लगते हैं...कोई रिश्ता रिजेक्ट न हो जाए...कोई ये न कहे क्या सीखकर आयी अपने घर से वगैरह वगैरह, भेदभाव तभी से होने लगता है

जब आप बेटी की पढ़ाई उसे आर्थिक निर्भरता, जानकारी या आत्मविश्वास देने के लिए नहीं बल्कि मैरिज मार्केट में उसका बायो डाटा अच्छा बनाने के लिए कराते हैं...बीए या बहुत हुआ तो एमए करते ही बाँध दो किसी के पल्ले, मॉ बाप की सबसे बड़ी चिंता यही होती है की बेटी की शादी के लिए क्या तैयारी करनी है । दिक़्क़त ही हैं कि आपके लिये एक अविवाहित बेटी बोझ होती है...आपको बेटी के बेरोज़गार होने से ज़्यादा उसका अविवाहित होना परेशान करता है, माँ पिता यह कभी नहि सोचते की उनकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी हो आर्थिक रूप से निर्भर हो भविष्य के लिए कुछ नहि करते पर शादी के लिए सबकुछ ।

गाँव में रहने वालों या आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की बातें समझ में आती है पर जो शहरों और महानगरों में रहते है वह भी ...?????? परम्परा के आगे सोच ही नहि पाते । भेदभाव ही है कि आपके लिए बेटी के घर का पानी पीना भी पाप है, बेटी की कमाई इस्तेमाल करना गुनाह ! वो बेटियां जो अपनी मेहनत से परिवार, देश और दुनिया के विकास के लिए योगदान दे सकती थी आपको अंदाज़ा भी नहीं कि आपकी ये शादी मार्केट की महत्वाकांक्षाएं उन्हें कहीं का नहीं छोड़तीं। सिर्फ़ किचन तक सीमित हो कर रह जाती है । बदलिए ख़ुद को, आपके साथ से ज़्यादा कुछ मायने नहीं रखता...अगर माँ बाप साथ हों तो वो दुनिया से लड़ जाएंगी...उसे छुईमुई नहीं बनाइये...संघर्षों की जो ज़िन्दगी आप उसे तोहफ़े में देते हैं उससे बेहतर है उसे अपने दम पर जीना सिखाइये और इसके लिए होने वाले संघर्षों के लिए तैयार कीजिए।

RAJ KUMAR /UDAY RAJ PASI
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