मज़ा और है

इश्क़ में ज़िंदगी का मज़ा और है। फिर तेरी आशिक़ी का मज़ा और है।। मौत का ग़म नहीं तू मिला जो हमें। तुझसे दिल की लगी का मज़ा और है।। मैं तडपती रहूँ बिन तेरे दम-ब-दम। साँस की तिश्नगी का मज़ा और है।। तेरी पलकों के साये में बीते सफ़र। ऐसी आवारगी का मज़ा और
 
मज़ा और है

इश्क़ में ज़िंदगी का मज़ा और है।
फिर तेरी आशिक़ी का मज़ा और है।।

मौत का ग़म नहीं तू मिला जो हमें।
तुझसे दिल की लगी का मज़ा और है।।

मैं तडपती रहूँ बिन तेरे दम-ब-दम।
साँस की तिश्नगी का मज़ा और है।।

तेरी पलकों के साये में बीते सफ़र।
ऐसी आवारगी का मज़ा और है।।

रूप तेरा खिला तो सबेरा हुआ।
ज़ुल्फ़ की तीरगी का मज़ा और है।।

ये नज़ारे नज़र को लुभायें भले।
पर तेरी दिलक़शी का मज़ा और है।।

लाख राहें मिलीं आके “पूनम” से ख़ुद।
पर तुम्हारी गली का मज़ा और है।।

आईने में चाँद ग़ज़ल संग्रह
तिश्नगी-प्यास, ज़ुल्फ़-बाल, तीरगी-अँधेरा, दिलकशी-चित्ताकर्षण

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