स्पाइन की चोट के मामले में समय पर इलाज के द्वारा मरीज़ को बचाया जा सकता है : अपोलो हाॅस्पिटल्स

स्पाइन की चोट के मामले में समय पर इलाज के द्वारा मरीज़ को बचाया जा सकता है : अपोलो हाॅस्पिटल्स

 स्पाइनल यानि रीढ़ की चोट के मामले में मरीज़ को समय पर एवं सुरक्षित रूप से एम्बुलेन्स के द्वारा टर्शरी हाॅस्पिटल तक पहुंचाने के फायदों के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिए इन्द्रप्रस्थ अपोलो हाॅस्पिटल्स ने एक प्रेस सम्मेलन का आयोजन किया। प्रेस सम्मेलन के दौरान लोगों को बताया गया कि समय पर और सही इलाज उपलबध कराने से कैसे मरीज़ के जीवन को बचाया जा सकता है और अपंगता की संभावना को कम किया जा सकता है।

 डाॅ राजेन्द्र प्रसाद, सीनियर कन्सलटेन्ट, स्पाइन सर्जन, इन्द्रप्रस्थ अपोलो हाॅस्पिटल्स ने युवा मरीज़ों में रीढ़ की चोट के तीन मामलों पर चर्चा की जिनमें समय पर इलाज के चलते मरीज़ का जीवन बचा लिया गया। इसके बाद न्यूरो-रीहेबिलिटेशन के द्वारा उनके खोए न्यूरोलोजिकल फंक्शन्स फिर से सामान्य हो गए। जिसके चलते उन्हें स्थायी अपंगता से बचाया जा सका और आज वे व्हीलचेयर के बजाए अपने पैरों पर चल सकते हैं।

डाॅ प्रसाद ने बताया, ‘‘21 वर्षीय प्रियंका पहली मंज़िल से गिर गईं, जिसके बाद उनकी पीठ में बहुत तेज़ दर्द था, उनकी टांगों में कमज़ोरी आ गई थी और उन्हें यूरीन रीटेन्शन की समस्या भी हो गई। एमआरआई से पता चला ि उनके एल 1 लम्बर फ्रैक्चर था और फ्रैक्चर के कारण स्पाइनल कोर्ड में कम्प्रेशन हो गया था। डीकम्प्रेशन और स्पाइन के स्थिरीकरण के लिए दो सर्जरियों की ज़रूरत थी। उन्हें ठीक होने में तीन महीने का समय लगा और अब वे अपने पैरों पर चल सकती हैं। इस मामले में सफल इलाज का श्रेय उनके परिवार को दिया जा सकता है जिन्होंने बिना देरी किए सुरक्षित रूप से उन्हें तुरंत अस्पताल पहुंचाया। जब वह अस्पताल पहुंची, उनकी टांगों में पैरालिसिस था और वह अपना ब्लैडर फंक्शन खो चुकी थीं। प्रियंका ने कहा, ‘‘मैं डाॅ तरूण साहनी और डाॅ राजेन्द्र प्रसाद की मेडिकल टीम के प्रति आभारी हूंँ, जिनकी वजह से आज में ठीक हूँ और जल्द ही मेरी शादी होने वाली है।’’

डाॅ प्रसाद ने दुर्घटना की साईट पर स्पाइनल इंजरी के प्रबंधन केे महत्व के बारे में बताते हुए सम्मेलन का समापन किया। ‘‘यह बहुत ज़रूरी है कि ट्राॅमा केे मरीज़ को तुरंत एबीसी (एयरवे, ब्रीदिंग, सर्कुलेशन) सपोर्ट मिले। यह सपोर्ट प्रशिक्षित लोगों या पुलिसकर्मियों द्वारा दिया जा सकता है। इसके बाद मरीज़ को प्रशिक्षित पैरामेडिक स्टाफ और एम्बुलेन्स की मदद से सुरक्षित रूप से अस्पताल पहुंचाना चाहिए। मरीज़ को ‘गोल्डन ऑवर ऑवर’ के अंदर स्पाईन बोर्ड पर रख कर अस्पताल पहुंचाना चाहिए ताकि चोट और गंभीर न हो जाए। पाॅलीट्राॅमा के गंभीर मरीज़ों को सीधे टर्शरी अस्पताल में ही लेकर जाना चाहिए जहां ट्राॅमा टीम, सिर, स्पाइन, छाती, लिम्ब्स और एब्डाॅमिनल चोटों का सही इलाज कर सके। इस तरह उचित देखभाल के द्वारा कई ज़िंदगियों को बचाया जा सकता है और स्थायी अपंगता की संभावना को कम किया जा सकता है। इसके अलावा एक्यूट केयर केे बाद मरीज़ को न्यूरो रीहेबिलिटेशन की ज़रूरत होती है ताकि मरीज़ फिर से आत्मनिर्भर हो जाए और अपने सभी काम खुद कर सके। सामान्य जीवन जी सके और काम पर जा सके।’’

Support to Swatantra Prabhat Media

T & C Privacy

Comments