वाह रे न्याय व्यवस्था। धारा 107 /126 151

वाह रे न्याय व्यवस्था। धारा 107 /126 151

कानून का मजाक नहीं बने हाईकोर्ट से निवेदन बिल्हा मामले को संज्ञान में ले 
- अक्तूबर 28, 2015

बिलासपुर जल रहा है, कैसे उम्मीद करें कि नक्सलवाद मिट जाएगा। कानून से लोगों का भरोसा उठ रहा है लोग कहां जाए? कोर्ट के सामने आत्मदाह कोई मामूली नहीं, जेल में जमानत मिले व्यक्ति की मौत कोई मामूली नही। हाईकोर्ट से निवेदन है इस मामले में सवत: संज्ञान में लेकर पीड़ितों को न्याय दिलाएं।

वाह रे न्याय व्यवस्था।

आंतकी को बचाने सुप्रीम कोर्ट रात में खुल सकता है, लेकिन जमानत मिलने के बाद जेल से आरोपी नहीं छूट सकता कैसा कानून है यह कैसी न्याय प्रणाली है यह?

- इन दुखद घटनाओं को देखकर भारत के  कानून को क्या नाम दूं...?

- ओ जलता रहा और काले कोर्ट पहने, सफेद पोस लोग सब देखते रहे...?
- ओ एक था और आप सौ...उसे बचा नहीं पाए लानत है आपको।

बिलासपुर में 20 दिन दो मौत...वजह एक फंडा 107,116

107, 116 की पेशी के बाद जमानत नहीं मिलने से हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर दो लोगों की मौत हो चुकी है। यह जो धारा है किसी हत्या या बलात्कार करने के लिए नहीं बल्कि सामान्य शांति भंग के लिए उपयोग की जाती है। जानकार कहते हैं कि इसकी जमानत मुचलके पर थाने से हो जाती है। इसके बाद भी दो की मौत हो जाना कुछ तो वजह रही होगी।

यह
न्यायधानी है
यहां कानून का मजाक बन गया है।
न जाने न्याय के लिए और कितनी मौत देखनी होगी बिलासपुर के लोगों।


केस 1
 सेवती के जीवनलाल मनहर । 6 अक्टूबर को पेशी के बाद  सेवती के जीवनलाल मनहर को सेंट्रल जेल भेज दिया गया था। उसे जमानत नहीं मिलने से पुलिस जेल भेज दी थी। देर रात उसे जमानत मिली। उसके खिलाफ गांव के सरपंच ने तालाब के विवाद में शांति भंग हो जाने की शिकायत किया था। यह मामला पैतृक संपत्ति से जुड़ा था। इसके बाद भी उसे जेल भेजा गया। हलांकि जानकार कहते हैं कि 107, 116 में थाने से मुचलका पर जमानत हो जाती है, इसके बाद भी बंदपत्र प्रस्तुत करने पर एसडीएम ऐसे मामले में आरोपी के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई कर सकता है। हुआ भी यही एसडीएम ने प्रतिबंधात्मक कार्रवाई किया। जीवनलाल को आरोपी बता कर जेल भेज दिया गया। जेल जाने से पहले किसी भी कैदी या बंदी की मेडिकल परीक्षण होती है, जीवनलाल के साथ ऐसा कुछ हुआ... फिर भी उसकी जेल के भीतर मौत हो गई। वह भी संदिग्ध परिस्थितियों में। इससे पहले उसे जमानत मिल चुकी थी, लेकिन उसे रात होने के कारण जेल से नहीं छोड़ा गया। यहां पर उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट एक आंतकी जो कि सैकड़ों मौत के लिए जिम्मेदार था के मामले को सुनने के लिए रात में खुल सकता है, लेकिन एक जमानत मिले आदमी को इसलिए रात में नहीं छोड़ा जा सकता क्योंकि रात है। वाह रे कानून...वाह रे न्याय व्यवस्था।

केस 2
बिल्हा के राजेंद्र तिवारी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से महज 6 किमी दूर बसे बिल्हा के एसडीएम कोर्ट के सामने युवक आत्मदाह कर लिया। 26 अक्टूबर को बिल्हा के वार्ड नंबर 6 में रहने वाला राजेंद्र तिवारी उर्फ लालू बिल्हा एसडीएम कार्यालय पहुंचता है। उसे अग्रिम जमानत की दरकार है। उसके खिलाफ 107,116 के तहत तथाकथित रूप से बिल्हा पुलिस ने मामला दर्ज की थी। उसे जमानत नहीं मिली, उल्टा मिलता है धमकी जेल में मारने की। इस भय से वह इतना क्षुब्ध हो जाता है कि यह युवक अग्नी स्नान कर लेता है। पूरी न्याय व्यवस्था को तार-तार कर देने वाली यह घटना कानून की काली करतूत और घिनौने परदे को उठाती है। यह कैसी न्याय व्यवस्था है जिसमें थाने से मुचलका मिलने वाले मामले के आरोपी को इतना दौ़ड़ाया जाता है परेशान किया जाता है कि लोग आत्महत्या कर लेते हैं। ऐसे मामले में पुरा देश छूट जाता है उसके लिए अधिकारी और बाबू(जो एक नबंर के लालची और चिंदीचोर होते हैं) इतना परेशान कर देते हैं कि लोग मर रहे हैं। कानून का मजाक नहीं तो और क्या है, यह कानून मजाक के लिए देश में बनाया गया है। युवक की मौत हो चुकी है। अधिकारी, कर्मचारी या किसी भी जिम्मेदार के खिलाफ अब तक न कार्रवाई की गई है, न आगे किए जाने की उम्मीद दिख रही है।

हाईकोर्ट में बैठे तमाम जज साहबो से निवेदन है प्लीज इस मामले में एक बार प्लीज इस तरफ नजर घुमाईए। इधर हो रहे कानून के साथ मजाक को खत्म किजीए। अगर न्यायधानी में कानून का मजाक उढ़ाया जाता है वह भी  आपके नाक के नीचे और आप खामोश रहते हैं कानून का मजाक नहीं पुरी कानून मजाक बन जाएगी। इस ओर शासन और प्रशासन के साथ ही हाईकोर्ट को ध्यान देने की जरूरत है।

दीपेंद्र शुक्ला के ब्लॉग से... 

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