अदानी से अपने पहाड़ को बचाने दिन-रात डटे हैं आदिवासी

अदानी से अपने पहाड़ को बचाने दिन-रात डटे हैं आदिवासी

छतीसगढ़, बस्तर में अदानी समूह को खदान लीज पर दिए जाने के विरोध में धरना देते आदिवासी।  

बस्तर के आदिवासी अपने आस्था के पहाड़ नंदाराजा को बचाने के लिए धरना दे रहे हैं। दिन भर नारेबाजी और रात को जल, जंगल और जमीन से जुड़े आंदोलन के गीत गाते हैं। पहाड़ की लौह अयस्क खदान अदानी को दिए जाने के विरोध में इनके स्वर मुखर होते जा रहे हैं। धरनारत आदिवासियों में ओडिशा के काशीपुर आन्दोलन के युवा नेता भगबान माझी का गीत "गाँव छोड़व नहीं..., जंगल छोड़व नहीं..., माय माटी छोड़व नहीं..., लड़ाई छोड़व नहीं..." खूब लोकप्रिय हो रहा है। जिसका अर्थ है- हम गाँव नहीं छोड़ेंगे, जंगल नहीं छोड़ेंगे, माटी माँ को नहीं छोड़ेंगे और न हम लड़ाई छोड़ेंगे।

गौरतलब है कि बस्तर के दंतेवाडा जिले के किरंदुल स्थित बैलाडीला आयरन ओर माइंस परिसर (एनएमडीसी) कार्यालय के सामने आदिवासियों का सात जून को शुरू हुआ था। दंतेवाडा जिले के संयुक्त पंचायत समिति के अगुवाई में हो रहे यह आन्दोलन एनएमडीसी द्वारा अदानी ग्रुप को 13 नंबर खदान दिए जाने पर अनिश्चित कालीन हड़ताल एवं विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

इस धरना प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लोग गंगलुर, मेटुर, पिट्टेपाल, हुरेपाल और मुंडेर जैसे 50 किमी स्थित दूर दराज गाँव से अपने साथ राशन पानी लेकर एक दो दिन का पैदल सफ़र तय करते हुए यहाँ पहुंचे हैं। बीजापुर जिले के इरोलेई ग्रामपंचायत के पीरनार गाँव से आई करीब 60 साल की आदिवासी महिला जोगी मांडवी ने हम से बात करते हुए कहती हैं- “ जब तक हम नंदराज पहाड़ को नहीं बचा लेते हैं। तब तक हम यहाँ से नहीं जाएंगे।”

उन्होंने आगे कहा कि वह इस तरह के आन्दोलन में शामिल होने दिसम्बर माह में भी आई थीं। जोगी मंडावी विधवा हैं और 2 लड़के एक लड़की और नाती पिला भी हैं। उनके पास छोटे छोटे 3 खेत हैं जिनमें एक एक में 7/8 खंडी धान उगा लेते हैं यानी कुल मिलाकर 20/22 बोरी धान का उत्पादन कर लेते हैं। जंगल से भी कई चीजें इकठा कर लेते हैं। जोगी मंडावी ने अपने गाँव की पानी की समस्या के बारे में भी कहा कि वह पानी लाल है। गौरतलब है कि इस क्षेत्र में खदानों के चलते कई नदी नालों के पानी प्रदूषित हो गए हैं और पीने लायक नहीं हैं, जिसे लेकर लोगों में दुःख और गुस्सा भी है।  

इस आन्दोलन में शामिल होने आये पिटौड़मेटा के कुछ युवक-युवतियों में से एक आयतों कुंजामी ने हमसे बात करते हुए अपना गुस्से का इजहार किया – “ हम यहाँ नंदराज पहाड़ी को बचने आये हैं। हमें पूरा कारखाना बंद कराना है, क्योंकि इन कारखानों से हमें कोई फायदा नहीं मिल रहा है। एनएमडीसी इतने साल से इधर है, यहाँ आदिवासियों को न कोई नौकरी मिल रहा है और न कोई सुविधा। हमारा  पानी, जमीन सब बर्बाद हो रहा है। यह सब पहाड़ हम आदिवासियों का है, इसमें हम और हमारे देवी-देवता निवास करते हैं और ये खदान पहाड़ों को खत्म कर रहा है। इस लिए हम अडानी के साथ एनएमडीसी को भी भगाना चाहते हैं”।  

 उनके साथ आई एक लड़की, जो अपना नाम नहीं बताना चाहती थी ने कहा- “हम लोग खेती करते हैं, धन और मक्का उत्पादन करते हैं। और बाकी समय में जंगल से लकड़ी, महुआ, पत्ता और दूसरी कई चीज लाते हैं, लेकिन पहाड़ ही नहीं होगा और जंगल नहीं होगा तो हम कैसे करेंगे? वहीँ साथ में आये पार्षद जो अपना नाम नहीं बताना चाहते हैं ने कहा – “ हमारे पर्यावरण और प्रकृति का नुकसान हो रहा है। उसके साथ-साथ हमारी आदिवासी संस्कृति और आजीविका भी संकट में है।  

यहाँ खदान होने से हमें कोई फायदा नहीं हुआ है, बल्कि हमारे लिए मुसीबत और संकट बन गया है”।  अब यह आन्दोलन धीरे-धीरे जोर पकड़ने लगा है। राजनीतिक दल भी इन्हें समर्थन करने आगे आ रहे हैं। धरने के दूसरे दिन धरना स्थल पर पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी पहुंचे और आन्दोलनकारियों को अपना समर्थन देते हुए आदिवासियों का आस्था का स्थल नन्दराज से लीज वापस करने की मांग की है। वह नंदराज पर्वत भी गये और पूजा अर्चना की। उन्होंने कहा, “ राम मंदिर जैसे हिन्दुओं का आस्था का स्थल है वैसे ही नन्दराजा पहाड़ एक देव स्थान है, इसलिए यह आदिवासियों  का आस्था और श्रद्धा स्थल है जहाँ हम उत्खनन नहीं होने देंगे”।  

इस आन्दोलन में शामिल हुए आदिवासी नेता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी डाउन टू अर्थ से बात करते हुआ कहा- “ मैं खुद आदिवासी हूँ और ये सब मेरे आदिवासी बहन हैं। ये जंगल, जमीन हमारा है और हम इसलिए हम लोग लड़ रहे हैं। और ये नंदराज पहाड़ को लेकर बात हो रही है, यह हमारी आस्था की बात है। साथ ही, हमारा जल, जंगल और जमीन को माइनिंग के नाम पर जिस तरह से नष्ट किया जा रहा है, पेड़ों को काटा जा रहा है, चट्टानों को काटा जा रहा है इस से हमारे आदिवासियों का जीवन यापन खत्म हो सकता है, इसलिए हम सब चाहते हैं कि यह जल, जंगल और जमीन ही हमें चाहिए, इसके सिवा कुछ नहीं और मुझे यह पता था कि लोग एक दिन इस तरह से आगे आएंगे।

पारम्परिक हथियार आदिवासी युवाओं का आभूषण समान है, फिर भी यह आन्दोलन शांतिपूर्ण है। फोटो: पुरुषोत्तम सिंह ठाकुर 

सोनी सोरी ने आगे कहा – “ यह आज एक बार का आन्दोलन नहीं है, इस तरह से कई बार लोग एक जुट होकर बाहर आते हैं अपनी बात रखने के लिए। तो इस बार ज्यादा संख्या में लोग आये हैं। इससे यह लग रहा है कि हर आदिवासी दिल से इस बात को लेकर जागरूक है कि वह अपने जल, जंगल,जमीन नहीं देंगे, खासकर नंदराज पहाड़ी को लेकर वे काफी संवेदनशील हैं। नंदराज पहाड़ी में हजारों साल से पूजा पाठ होता आया है, हमारे पूर्वज भी पूजा पाठ करते आये हैं और आज की नई पीढ़ी भी इस बात को लेकर वाकिफ है। इसलिए इस बात का सबको दर्द है कि हम को तो कुचला जा रहा है। साथ साथ हमारे देवी-देवताओं को भी कुचल रहे हैं। हम जान दे देंगे, अपना खून बहायेंगे पर हमारी जल, जंगल, जमीन और हमारी मानवता को ख्त्म करने की साजिश को हम कामयाब नहीं होने देंगे।”  

गौरतलब है कि बैलाडीला डिपोजिटी-13  में 315.813  हैक्टेयर रकबे में लौह अयस्क खनन के लिए वन विभाग ने वर्ष 2015 में पर्यावरण क्लीयरेंस दिया है। जिस पर एनएमडीसी और राज्य सरकार को संयुक्त रूप से उत्खनन करना था। इसके लिए राज्य व केंद्र सरकार के बीच हुए करार के तहत संयुक्त उपक्रम एनसीएल बनाया गया था। लेकिन इसे निजी कंपनी अदानी को 25 साल के लिए लीज हस्तांतरित कर दी गई है। इस रकबे में 25 करोड़ टन लौह अयस्क मौजूद होने की बात कही जा रही है।  सरकार और कंपनी पर यह भी आरोप है की अडानी ग्रुप ने सितम्बर 2018 को बैलाडीला आयरन और माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई और दिसम्बर 2018 को केंद्र सरकार ने इस कंपनी को लीज दे दी।

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