अजमेर गुर्जर समाज की आपातकालीन बैठक गुरुवार को

अजमेर गुर्जर समाज की आपातकालीन बैठक गुरुवार को

सामाजिक कुरीति "बावनी" के विरुद्ध अजमेर गुर्जर समाज की आपातकालीन बैठक गुरुवार को

अजमेर/राजस्थान
समाज/संस्कृति/कुरीति

               अजमेर निवासी भगवान गुर्जर ने बताया की " गुर्जर समाज के सभी पँच पटेलों व समाज के सभी सामाजिक संगठन के समस्त पदाधिकारीयो व जनप्रतिनिधियों युवाओं को गुरूवार को सुबह समय 11 बजे  ऊबड़ा का देवरा श्रीदेवनारायण मन्दिर अजमेर चन्दरलाई में रखी गई  इस आपातकालीन  बैठक के सन्दर्भ में सूचित किया गया है ।


                
                      पूर्व में पुष्कर महापँचायत में समाज सुधार समिति द्वारा बावनी व गँगोज पर पूर्णतया पाबन्दी लगाई गई थी परन्तु ग्राम देवमाली में गुर्जर समाज के नियमों कि अवहेलना करते हुए परिवार विशेष द्वारा बावनी अक्टूबर में होना प्रस्तावित है अतः ऐसी सामाजिक कुप्रथा को रोकने बाबत् समाज सुधार समिति द्वारा यह आपातकालीन बैठक बुलाई गई है। "

                सभी समाज बन्धुऔं से आग्रह है कि अधिक से अधिक संख्या में पधारें और ऐसी कुप्रथा को मिटाने हेतू अपना सहयोग प्रदान करें जिससे भावी पीढ़ी दुष्परिणाम नही भुगतने पडे। "

 

 

              अजमेर के आनंद भड़ाणा ने बताया कि " पूर्व में भी सवाईभोज समिति पुष्कर द्वारा भी इस संदर्भ में गुर्जर समाज बन्धुओ द्वारा कई मीटिंगो का आयोजन किया गया साथ ही जिला प्रशासन तक भी ऐसी कुरूतियो को रोकने सम्बन्धी सूचना शिकायत पहुँचाई गई ।

               बैठक में अजमेर शहर सहित जिला संभाग के मसूदा,नसीराबाद,पुष्कर,किशनगढ़,
बन्दरवाड़ा,सरवाड़,बलवन्ता घूघरा घाटी आदि सम्बन्धित क्षेत्र के समाज बन्धुओ तक सूचना पहुँचाने का कार्य किया गया है।"

 

                  श्री देवनारानायण गुर्जर समाज के आराध्य

                              जाने क्यों और क्या होती है "बावनी"

आदि काल से एक प्रथा चली आई थी जो कि वर्तमान परिवेश में कुप्रथा के स्वरूप में तब्दील हो चुकी है ।
                                                              गुर्जर जाति सहित अन्य समाजो में चलती आई थी
           जिसके तहत गुर्जर समाज मे किसी की मृत्यु के पश्चात 52 गांवो का सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता था जिसमे 52 गांवो के सभी जाति समाज के लोगो को सामूहिक भोज हेतु आमंत्रित किया जाकर भोज मे शामिल किया जाता है।


                            ऐसे भोज कार्यक्रमो में चौरासी गांव तक भी जिसे 'चौरासी' शामिल होते हैं
           जिसके चलते सम्बन्धित परिवारों द्वारा तत्काल बाल-विवाहों का भी आयोजन किया जाता रहा जिसमे होडाहोड़ मायरे (भात) का आयोजन किया जाता है। 


                    जिसके कारण सम्बन्धित परिवारो की पीढियां वर्षो तक आर्थिक अधिभार में डूब जाते है जिसके  तहत हुवे बाल विवाह रूपी रिश्ते भी प्रायः आगे जाकर निभ पाने कठिन होते हैं ।
      समाज के पूंजीपतियों द्वारा अपने परचम को दिखाने के लिए ऐसे आयोजन करने से गरीब मध्यम वर्गीय लोगो का जीवन आर्थिक रूप से प्रेशनियोमे घिर जाता है प्रायः पंच पटेलों द्वारा ऐसे आयोजनो का जिम्मा लेकर भोज आदि तो करवा दिया जाता है पर असक्षम परिवार कर्ज में डूबकर जीवन भर उस आर्थिक कर्ज की पूर्ति नही कर पाते जिसके कारण एक अच्छा  स्वस्थ जीवन बाल बच्चो की पढ़ाई सम्रद्धि से दूरी बन जाती हैं।


           एसे आयोजनो के कारण एक दम से सम्बन्धित समधी वर्ग को भी मायरे (भात) की होडाहोड में आर्थिक रूप से पीसना पड़ता है


             जिसके चलते गरीब मध्यम वर्गीय खेती पशु पालन आजीविका पर आश्रित परिवार निरन्तर अनचाहे कर्ज के बोझ मे पीढ़ियों तक दबे रह जाते हैं। 


      जिसके कारण गांवो में निवास करने वाले अल्पशिक्षित,अशिक्षित गुर्जर समाज के लोग आज भी इस कुप्रथा को ढो रहे हैं

       अतैव "बावनी चौरासीभोज बालविवाह " जैसी  कुप्रथाओं का विरोध होना भी आवश्यक है।

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खबर राजस्थान
स्टेट ब्यूरो चीफ
देवेन्द्र देव गुर्जर जोधपुर 

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