श्रृद्धा में भेदभाव किये बगैर समस्त मानव जाति को एक कुटुम्ब समझता है सूफिज्मः प्रो. आरसी सिन्हा

श्रृद्धा में भेदभाव किये बगैर समस्त मानव जाति को एक कुटुम्ब समझता है सूफिज्मः प्रो. आरसी सिन्हा

अलीगढ़

  अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा ‘‘सूफिज्म, मानवता तथा बहुलवादः भारतीय दृष्टिकोण’’ विषय पर इंडियन कौन्सिल आफ फिलोस्फीकल रिसर्च (आईसीपीआर) नई दिल्ली के सहयोग से दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया।

 यूनिवर्सिटी पालीटैक्निक ब्वायज में सेमिनार के उद्घाटन समारोह में इंडियन कौन्सिल आफ फिलोसफीकल रिसर्च के अध्यक्ष प्रो. आरसी सिन्हा ने मुख्य अतिथि तथा अमुवि के सहकुलपति प्रो. अख्तर हसीब ने मानद् अतिथि के रूप में भाग लिया।

मौलाना आजाद विश्वविद्यालय, जोधपुर के अध्यक्ष प्रो. अख्तरूल वासे विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रहे। जबकि विश्व भारतीय यूनिवर्सिटी, शांतिनिकेतन, पश्चिमी बंगाल के प्रो. मोहम्मद सिराज उल इस्लाम ने बीजक भाषण प्रस्तुत किया।

प्रो.आरसी सिन्हा ने अपने सम्बोधन में अमुवि तथा यहां के अध्यापकों से अपनेसम्बन्धों की चर्चा करते हुए पहली बार दर्शन शास्त्र विभाग में आगमन यादों को ताजा किया।उन्होंने कहा कि सूफिज्म कासम्बन्ध मानवता कीसेवा से है तथा सूफी धर्म एवं नस्ल तथा श्रृद्धा में भेदभाव किये बगैर समस्त मानव जाति को एक कुटुम्बसमझता है तथा दबे एवं कुचले वर्ग का सेवक होता है।

उनहोंने कहा कि पश्चिमी विश्व में वैदान को सबसे प्रमुख भारतीय दर्शनशास्त्र बताया जाता है और यह प्रश्न भी उठाया जाता है कि शंकराचार्य के बाद क्या भारतीय दर्शन मर चुका है। प्रो. सिन्हा ने कहा कि वेदांन के दर्शनशास्त्र ने एक व्यवस्था के गठन पर बल दिया है और यहीं कारण है

कि भारतीय चिंतकों को पश्चिमी विश्व में दर्शनशास्त्री नहीं माना जाता। उन्होंने कहा कि दर्शनशास्त्र के अर्थ को परिवर्तित किये जाने की आवश्यकता है।प्रो. अख्तर हसीब ने कहा कि अध्यात्मिकता से सूफी का जन्म होता है जो आपसी सहिष्णुता का पक्षधर होता है।

उन्होंने कहा कि सेमिनार का विषय वर्तमान समय की महती आवश्यकता हैताकि समाज में मानवता एवं प्रेम तथा भाईचारा आम हो।उन्होंने कहा कि समस्त धर्मों में मानवता की सेवा बात कही गई है। आवश्यकता इस बात की है कि सूफिज्म को अपनी जीवनशैली बनाया जाए जिसमें किसी अन्य व्यक्ति से भेदभाव हीं बरता जाता तथा सभी की सेवा को दृष्टिगत रखा जाता है।

प्रो. अख्तर हसीब ने धार्मिक झगड़े को अनावश्यक बताते हुए आशा व्यक्त की कि दो दिवसीय सेमिनार से आपसी सौहार्द, शांति, भाईचारे तथा सौहार्द का पथ प्रशस्त होगा। कला संकाय के अधिष्ठाता प्रो. मसूद अनवर अल्वी ने भी अपने विचार व्यक्त किये। सेमिनार के आयोजक सचिव डा. अब्दुल शकील ने आभार व्यक्त किया। 

संचालन डा. शारिक अकील ने किया। इस अवसर पर विभाग के अध्यापक, शोधार्थी तथा छात्र व छात्राओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

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