जब एक माँ ने जन कल्याण के लिए अपने आँचल को बनाया अपने ही चार बच्चों का कफन

जब एक माँ ने जन कल्याण के लिए अपने आँचल को बनाया अपने ही चार बच्चों का कफन

गंगा राम,अमेठी।

त्याग की महानायिका का 121 वां  जन्म दिन मनाया गया-उस घड़ी के मंजर का चित्रण करना किसी के लिए भी मुश्किल हो जाएगा और आत्मा कराह देगी जब एक पिता अपने बच्चों के शव को कफन न उपलब्ध करा सके और माँ बेबस होकर अपने आँचल को फाड़कर अपनी ही संतान का कफन बनाये वो भी एक बार नही अपनी चार-चार संतानों के साथ ऐसा करना पड़े।
 
 ये मानवता का जकझोरने वाली घटना भारत की सबसे कलंकित जातिवादी व्यवस्था का दुष्परिणाम थी।

        हम बात कर रहे है विश्व के सबसे त्यागी दंपति डाक्टर बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर और उनकी जीवन संगिनी माता रमा बाई अम्बेडकर की।
 
       रामू मैं एक बेटे के लिए भारत के वंचित एवं शोषित समाज के  करोड़ो बच्चों के जीवन से खिलवाड़ नही कर सकता - ये बातें बाबा साहब ने तब कही थी जब माता रमा बाई अम्बेडकर ने अपने बच्चे के शव के लिए कफन लाने के लिए कहा तो बाबा साहब ने कफन खरीद पाने में पैसों के अभाव में असमर्थता जाहिर की और कहा मेरे पास पैसे बहुत कम हैं इससे मैं अध्ययन के लिए किताबें खरीद कर आने वाले समय में ऐसा काम करूंगा कि किसी को भी ऐसी घड़ी का सामना न करना पड़े।

          माँ का आँचल बना,चार संतानों का कफन। 
          जो कर रहा अब अत्याचारियों के मंसूबों को दफन।।

अपनी चार संतानों को मानव कल्याण के लिए बिना कफन के दफन करने वाले संसार के मात्र एक महापुरुष बाबा साहब डाक्टर भीम राव अम्बेडकर हैं- श्याम लाल गौतम ।

            भारत मे वंचितों के कल्याण के लिए अपनी चार संतानों की कफन अपने आंचल को फाड़कर बनाने वाली संसार की एक मात्र त्याग की प्रति मूर्ति माता रमा बाई अम्बेडकर हैं।
             संसार की एक मात्र त्याग की महानायिका यदि माता रमा बाई अम्बेडकर को कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी।जीवन लंबा होने के बजाय,प्रभावशाली होना चाहिए, जिसको की बाबा साहब की अर्धांगिनी माता रमा बाई अम्बेडकर ने अपनी 37 वर्ष के जीवन में कर करके दिखाया।

         इस संसार में जो भी अच्छे कार्य हुए हैं उनके पीछे किसी न किसी महान आत्माओं का बहुत बड़ा त्याग होता है, जिनके किये गए त्याग से ही संसार मानव विकास की ओर अग्रसर हैं,उनके महान त्याग का समाज सदैव ऋणी रहेगा।

भारत भूमि की पावन धरा पर एक विषमताओं से भरा हुआ समाज बहुत ही घ्रणित सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन की क्रांति के जनक विश्व विद्वान बाबा साहब अम्बेडकर के सफलतापूर्ण संघर्ष के पीछे माता रमा बाई अम्बेडकर जी का त्याग रहा है,उनकी 37 वर्ष की आयु को जीने से कहीं ज्यादा अतुलनीय समय त्याग और समर्पण कारगर साबित रहा। रमाबाई का जन्म एक गरीब परिवार में भीकू धत्रे (वलांगकर) और रुक्मिणी के घर हुआ था। वह अपनी तीन बहनों और एक भाई शंकर के साथ दाभोल के पास वनंद गांव के भीतर महापुरा इलाके में रहती थी । उनके पिता दाभोल बंदरगाह से मछली की टोकरी को बाजार तक ले जाकर अपने परिवार का जीविकोपार्जन करते थे। जब वह छोटी थी, तब उनकी माँ की मृत्यु हो गई थी और उनके पिता की भी मृत्यु हो जाने के बाद, उसके चाचा वलंगकर और गोविंदपुरकर बच्चों को बॉम्बे लेकर उनके साथ बाइकुला बाजार में रहने लगे थे।

रमाबाई के साथ बाबा साहब अंबेडकर ने 1906 में बायकुला की सब्जी मंडी में एक बहुत ही सादे समारोह में शादी की। उस समय बाबा साहब अंबेडकर की उम्र 14 और माता रमाबाई की उम्र नौ वर्ष थी। उनके लिए उनका स्नेही नाम "रामू" था, जब कि वह उन्हें "साहेब" कहती थी।

          रमाबाई की लंबी बीमारी के बाद 27 मई 1935 को दादर , बॉम्बे के हिंदू कॉलोनी के राजगुरु में मृत्यु हो गई । वो बाबा साहब अम्बेडकर के साथ 29 साल तक थी।
          सुबेदार रामजी अम्बेडकर अपने पुत्र भीमराव अम्बेडकर के लिए वधू की तलाश कर रहे थे। वहां उन्हे रमाबाई का पता चला, वे रमा को देखने गये। रमा उन्हें पसंद आई और उन्होंने रमा के साथ अपने पुत्र भीमराव की शादी कराने का निर्णय लिया। विवाह के लिए तारिख सुनिश्चित कि गई और अप्रैल 1906 में रमाबाई का विवाह भीमराव आंबेडकर से सपन्न हुआ। विवाह के समय रमा की आयु महज 9 वर्ष एवं बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की आयु 14 वर्ष थी, और वे 5 वी अंग्रेजी कक्षा पढ़ रहे थे।

         माता रमाबाई अपने पुत्र यशवंत की बीमारी के कारण हमेशा चिंता में डूबी रहती थीं, परंतु फिर भी वह इस बात का पूरा ख्याल रखती थीं किबाबासाहेब के कामों में कोई व्यवधान न आए और उनकी पढ़ाई  खराब न हो,माता रमाबाई अपने पति के प्रयास से कुछ लिखना पढ़ना भी सीख गई थीं।साधारणतः महापुरुषों के जीवन में यह एक सुखद बात होती रही है कि उन्हें  जीवन साथी बहुत ही साधारण और अच्छे मिलते रहे,बाबा साहब भी ऐसे ही भाग्यशाली महापुरुषों में से एक थे, जिन्हें रमाबाई जैसी बहुत ही नेक  और आज्ञाकारी जीवन साथी मिलीं।

          रमाबाई अधिकतर बीमार रहती थीं। बाबा साहब उन्हें धारवाड भी ले गये। परंतु उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नही हुआ। बाबा साहब के तीन पुत्र और एक पुत्री देह त्याग चुके थे। बाबा साहब बहुत उदास रहते थे। 27 मई 1935 को उन पर शोक और दुःख का पर्वत ही टूट पड़ा। उस दिन नृशंस मृत्यु ने उनसे उनकी पत्नी रमाबाई को हमेशा - हमेशा के लिए छीन लिया।दस हजार से अधिक लोग माता रमाबाई के परिनिर्वाण में शामिल हुए थे।

       बाबासाहब का अपनी पत्नी के साथ अगाध प्रेम था। बाबा साहब को विश्व विख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ था। रमाबाई ने अति निर्धनता में भी बड़े संतोष और धैर्य से घर का निर्वाह किया और प्रत्येक कठिनाई के समय बाबा साहेब का साहस बढ़ाया। उन्हें रमाबाई के निधन का इतना धक्का पहुंचा कि वो हर पल बहुत उदास, दुःखी और परेशान रहते थे। वह जीवन साथी जो गरीबी और दुःखों के समय में उनके साथ मिलकर संकटों से जूझती रही और अब,जब कुछ सुख पाने का समय आया तो वह सदा के लिए बिछुड़ गई।

         अमेठी के बाजार शुक्ल के दख्खिन गांव क्यार में 10 जनवरी 2019 को डॉक्टर अम्बेडकर जन कल्याण समिति और माता सावित्री बाई महिला कल्याण समिति ने त्याग की प्रतिमूर्ति माता रमा बाई अम्बेडकर का जन्म दिन समाज सेवी राम दीन के आयोजन में मनाया गया।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने इन त्याग की महानायिका के जीवन पर प्रकाश डाला और इन महान हस्तियों से सीख लेकर समाज से भेदभाव, शोषण और अत्यचार खत्म करके समानता को स्थापित करने के लिए बढ़ चढ़ कर कार्य करने के लिए आगे आने की अपील की।
            कार्यक्रम के मुख्य अतिथि तेजवीर सिंह अपने सम्पूर्ण परिवार के साथ कार्यक्रम  में आकर वहाँ पर उपस्थित सैकड़ो सैकड़ों महिलाओं को माता रमा बाई अम्बेडकर के जीवन से सीख लेकर समाज कल्याण के लिए आगे आने की अपील की।
          कार्यक्रम का संचालन विजय कुमार गौतम कर रहे थे, श्याम लाल गौतम,कमलेश सिंह,शशि कला सिंह, प्रेम शंकर, काशी राम बौद्ध,सत्य शरण बौद्ध,नन्द कुमार त्यागी आदि लोगों ने भी संबोधित किया। कार्यक्रम में जय प्रकाश ,आशा राम,सूर्यांश,राम सरन,राम उजेर, किरन, सुमन लता,आमिनी आदि सैकड़ो बच्चे एवं महिलाये भी उपस्थित थी।

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