पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता वास्तविक स्वतंत्रता को धोखा देना है

पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता वास्तविक स्वतंत्रता को धोखा देना है

 

उच्चतम न्यायालय ने एक बार फिर प्रेस की स्वतंत्रता की अहमियत को रेखांकित करते हुये कहा है कि लोकतंत्र की मजबूती केलिए प्रेस की स्वतंत्रता जरूरी है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि कोई भी क़ानून मीडिया को गोपनीय काग़ज़ात प्रकाशित करने से नहीं रोक सकता। हालांकि उच्चतम न्यायालय ने मीडिया में पक्षपात के गलत चलन को लेकर आगाह भी किया है और कहा है कि पक्षपातपूर्ण जानकारी प्रसारित करना, वास्तविक स्वतंत्रता को धोखा देना है।


राफेल सौदे की सुनवाई में नए दस्तावेजों पर विचार करने का निर्णय लेने के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि न तो भारतीय संसद का बनाया कोई क़ानून और न अंग्रेज़ों का बनाया ‘ऑफ़िशियल सीक्रेट ऐक्ट’ मीडिया को कोई दस्तावेज़ या जानकारी प्रकाशित करने से रोक सकता है और न ही कोर्ट इन दस्तावेज़ों को ‘गोपनीय’ मान सकता है । साथ ही न्यायालय को भी गोपनीय दस्तावेजों पर विचार करने से नहीं रोक सकता है।


मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएस जोसफ की पीठ ने यह बात केंद्र सरकार की उस आपत्ति पर कही है, जिसमें कहा गया था कि एक अखबार ने गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित किया है। जहां सरकार का कहना था कि गैरकानूनी तरीके से दस्तावेज हासिल कर इसे प्रकाशित किया गया है, इसलिए इन्हें पुनर्विचार याचिकाओं के जरिए रिकार्ड पर नहीं लिया जाना चाहिए।

वहीं उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि इस तरह के दस्तावेजों का प्रकाशन संविधान के तहत मिले बोलने व अभिव्यक्ति केअधिकार के अनुरूप है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस गोगोई और जस्टिस कौल ने एक फैसला सुनाया, जबकि जस्टिस जोसेफ ने जस्टिस गोगोई के फैसले से अपनी पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए अपना अलग से फैसला सुनाया।


मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजय किशन कौल ने अपने फैसले में कहा है कि वर्ष 1950 से उच्चतम न्यायालय लगातार प्रेस की आजादी की बात करता रहा है। फिर ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाता हो। साथ ही ऐसा कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं है जो ऐसे दस्तावेजों को अदालत में पेश करने पर रोक लगाता हो।

फैसले में है कहा गया है कि हमारी जानकारी में आपराधिक गोपनीय कानून या किसी अन्य कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसमें संसद द्वारा कार्यकारी अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेजों को प्रकाशित करने पर रोक लगाया गया हो।


फैसले में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के 1971 के फैसले के तथ्य पर ध्यान दिलाया है , जिसमें पेंटागन दस्तावेजों के प्रकाशन पर रोक लगाने के सरकार के अधिकार को मान्यता देने से इनकार किया गया था। जस्टिस गोगोई ने कहा है कि हमें ऐसा कुछ नहीं दिखता कि कैसे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का वो निर्णय आज के समय में (राफेल मामले) में लागू नहीं होता।

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