डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के संत कबीर सभागार में भारती बंधु कबीर के एक भजन

डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के संत कबीर सभागार में भारती बंधु कबीर के एक भजन

 

 


अयोध्या | सगुण और निर्गुण परम्परा के एक बड़े भजन गायक भारती बंधु कबीर के एक भजन के हवाले से कहते हैं- चार जने मिल अर्थी उठाई, बांधी कांठ की डोली, ले जाके मरघट में धर दई, फूंक दिए जस होली।

दिल्ली और मेरठ के 'किराना' घराने से उस्ताद आशिक अली खान और रायपुर के ही हाजी ईद अली चिश्ती की शार्गिदी में संगीत की तालीम लेने वाले भारती बंधु वैसे तो सात भाई है, लेकिन मंच पर भजनों की प्रस्तुति पांच भाई ही देते हैं...

भारती बंधु गणेश और दुर्गा पूजा में कार्यक्रम देते थे, मगर आयोजनकर्ता साजो-सामान लाने-ले जाने के लिए रिक्शे का किराया देना भी मुनासिब नहीं समझते थे। मुफलिसी का बेहद कठिन दौर देखने वाले भारती बंधु कहते हैं- हम लोग तबला और हारमोनियम को साइकिल में बांधकर ले जाते थे।
कमर जलालवी के एक शेर के हवाले से भारती बंधु कहते हैं- दबा के कब्र पर सब चल देंगे एक दिन... फिर न दुआ होगी न सलाम। हम कहते रह जाएंगे-जरा सी देर में क्या हो गया जमाने को।

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