"मेरे गांव में अब राम नहीं बसते" शीर्षक पर शोध कार्य होगा अवध विश्वविद्यालय में

"मेरे गांव में अब राम नहीं बसते" शीर्षक पर शोध कार्य होगा अवध विश्वविद्यालय में

अवध विश्वविद्यालय की अनूठी पहल ।

शोध के लिए संस्कृति एवं पुरातत्व विभागाध्यक्ष डॉ.अजय प्रताप सिंह ने उठाया बीड़ा।

शीर्षक है "मेरे गांव में अब राम नहीं बसते "

अयोध्या-

4 अक्टूबर 'मेरे गांव में अब राम नहीं बसते' इस शीर्षक पर अपने शोध छात्र से शोध कराने का बीड़ा उठाया है..

इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभागाध्यक्ष डॉ अजय प्रताप सिंह जी ने...


उक्त शीर्षक पर शोध कराने के लिए कुलपति आचार्य मनोज दीक्षित जी को पत्र लिखकर निवेदन किया था, वरिष्ठ पत्रकार और अवध विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास के सबसे सीनियर अध्यापक रह चुके शेष नारायण सिंह जी ने...


शेष नारायण सिंह जी ने जो लिखा था उसे आप भी पढ़िए...

मेरे गाँव में अब राम नहीं बसते

मेरे गाँव में पहले हर घर में राम रहते थे ,अब बहुत कम घरों में राम बचे हैं . गाँव के सबसे दक्षिणी छोर पर राम करन सिंह, उनके पड़ोस में राम फेर सिंह ,राम किशोर सिंह , राम खेलावन सिंह, राम स्वारथ सिंह ,

अगले घर में राम उजागिर सिंह, राम चरित्तर सिंह, राम चरण सिंह, राम नेवाज सिंह उनके पड़ोस में राम सुख सिंह, राम समुझ सिंह , सडक के इस पार राम राज सिंह,राम ओंकार सिंह ,राम सूरत सिंह , राम आधार सिंह, फिर उस पार राम  सहाय सिंह,

 राम अवध सिंह उनके पड़ोस में राम कलप सिंह,उनके पड़ोस में राम सूरत सिंह, दलित बस्ती में राम दास , राम जियावन, राम सुमेर, राम आसरे , उधर पाण्डेय के यहां राम बदन मिसिर, राम तवक्कल मिसिर, राम हौसिला मिसिर, राम पांडे , राम बोध पांडे नाम के लोग मेरे बचपन में मेरे गाँव की शोभा हुआ करते थे।

मेरे जन्म के साथ साथ ही मेरे गाँव में लोगों के नाम के सामने राम लिखना बंद हो गया . मेरी दहाई में मेरे और  इंद्र बहादुर सिंह के दोस्त ,राम आसरे  के नाम में राम था। अफ़सोस अब राम आसरे भी स्वर्गवासी हो चुके हैं ।

 मुझसे छोटे केवल दो राम हैं, राम कुमार सिंह और राम बहादुर सिंह ।

यह दोनों मुझसे छोटे हैं। इनके अलावा मैंने ऊपर जितने राम गिनाये  हैं , उनमे से केवल राम करन सिंह , राम सुख सिंह ,राम  खेलावन सिंह ही अब जीवित हैं . बाकी सभी स्वर्गीय हो चुके हैं। यह तीनों मुझसे करीब पन्द्रह साल बड़े हैं।उसके बाद जो भी लड़के पैदा हुए उसमें  बहादुर, प्रताप, कुमार आदि नामधारी लोग ही ज़्यादा हैं।

 मेरी कभी इच्छा थी कि अयोध्या जी  के एक 100 किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाले गाँवों के पुरुषों के नामों  का समाजशास्त्रीय अध्ययन करूंगा लेकिन अवसर ही नहीं मिला और अब उम्र  का चौथापन आ गया।

 आशा करता हूँ कि कोई पहलवान आने वाले समय में इसको अपनी थीसिस का विषय बनाये। इस बात की संभावना है कि अवध विश्वविद्यालय से वाइस चांसलर, मनोज दीक्षित और कार्यकारिणी सदस्य ओम प्रकाश सिंह किसी शोध छात्र को उत्साहित करें तो उपयोगी अध्ययन होगा।
शेष नारायण सिंह जी इस शोध कार्य में रिसोर्स पर्सन की भी भूमिका निभाएंगे।


इस अद्भुत पक्ष पर शोध कार्य का बीड़ा उठाने के लिए आदरणीय डॉ० अजय प्रताप सिंह, रिसोर्स पर्सन शेष नारायण सिंह जी और विश्वविद्यालय में शैक्षणिक गुणवत्ता क़ायम करने करने के लिए सदस्य कार्य परिषद ओमप्रकाश सिंह ने धन्यवाद ज्ञापित किया है।

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