हिंसक बगावती तेवर के साथ पैदा पश्चिम बंगाल और हिंसक राजनैतिक परिदृश्य पर विशेष

हिंसक बगावती तेवर के साथ पैदा पश्चिम बंगाल और हिंसक राजनैतिक परिदृश्य पर विशेष


हिंसक बगावती तेवर के साथ पैदा पश्चिम बंगाल और हिंसक राजनैतिक परिदृश्य पर विशेष

साथियों,

 आजादी के समय बगावती तेवर के साथ भारत में शामिल पड़ोसी देश से सटा हुआ राज्य पश्चिम बंगाल  आजादी के  समय से ही नहीं  बल्कि आजादी के पहले से अपनी राजनीतिक कार्यशैली के लिए  हमेशा चर्चा में  रहा है। 

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, श्यामाप्रसाद मुखर्जी ,गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर, चैतन्य महाप्रभु एवं काली देवी की पावन धरती से जुड़ा पश्चिम बंगाल आजादी के बाद लंबे समय तक वामपंथी दलों के कब्जे में रहा है और उन्होंने तीन दशकों तक लगातार इस राज्य पर शासन किया है। वाम दलों को सत्ताच्युत करने के लिए जो भी राजनीतिक दल सामने आया उसे वामदलों की हिंसक राजनीति का मुकाबला करना पड़ा है। वामदलों के तीन दशक से अधिक समय तक एकछत्र राज्य को नेस्तनाबूद करने के लिए तृणमूल कांग्रेस की वर्तमान मुख्यमंत्री भारत की बेटी कही जाने वाली ममता बनर्जी सत्ता तक पहुंचने के लिए यहां की हिंसक राजनीतिक का मुकाबला करना पड़ा है। 

गंगासागर की पावन भूमि से जुड़ा यह राज्य बंगलादेशी घुसपैठियों का शिकार रहा है और  इन घुसपैठियों को यहां की वामपंथी राजनीति ने वोट के लालच में हमेशा संरक्षण दिया है जिसका परिणाम है की पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। जिस राजनीतिक कार्यशैली के दम पर वामदल यहां पर शासन कर रहे थे उसी कार्यशैली को वर्तमान तृणमूल कांग्रेस  ने अख्तियार कर रखा है। आजादी के बाद से ही यहां पर चुनाव के समय ही नहीं बल्कि आए दिन राजनीतिक हिंसा होती रहती है और अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यको का शिकार होना पड़ रहा है। 

इतिहास साक्षी है कि अब तक यहां पर सैकड़ों राजनीतिक हत्या हो चुकी हैं और आयेदिन हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं। चुनाव के समय यह हिंसा और अधिक बढ़ जाती है। अभी पिछले ग्राम पंचायतों के चुनाव में भी यहां पर हिंसक घटनाएं हो चुकी हैं। इस समय देश में हो रहे लोकसभा चुनाव इस राज्य में भी हो रहे हैं और यहाँ का राजनैतिक परिदृश्य चर्चा का विषय बना हुआ है। उत्तर प्रदेश के बाद यह दूसरा राज्य है जहां पर सबसे ज्यादा लोकसभा की सीटें हैं यही कारण है कि पश्चिम बंगाल यूपी की तरह केन्द्र की सरकार बनने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। 

हिंदूवादी कही जाने वाली भाजपा आज तक के यहां पर पूरी तरस अपना भगवा  नहीं फहरा पाई है। इस बार हो रहे लोकसभा चुनाव में भाजपा अपना भगवा ध्वज लहराने के लिए  एड़़ी से चोटी तक का जोर लगा रही है और। दोनों के बीच यहां पर चुनावी महासंग्राम चल रहा है जिसकी वजह से पश्चिम बंगाल का राजनैतिक माहौल एक बार फिर सत्ता पाने की होड़ में हिंसक राजनीति का शिकार हो रहा है और अब तक कई घटनाएं हो चुकी हैं। 

यहां की सत्ताधारी पार्टी की सत्ता को उखाड़ने  के लिए भाजपा चुनाव के पहले से ही अपनी विशेष मुहिम चला रही है जिसका प्रबल विरोध सत्ता दल कर रहा है। इधर ज्यौं ज्यौ  लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण की तिथियां नज़दीक आती जा रही हैं त्यौ त्यौ  यहां का राजनीतिक परिदृश्य तनावपूर्ण एवं हिंसक होता जा रहा है। वैसे तो राजनीति में हिंसा का कोई स्थान नहीं है लेकिन यहां की राजनीति मैं हिंसा मुख्य आधार बनती जा रही है। 

वोटों के ध्रुवीकरण के लिए यहां के माहौल को एक बार फिर सांप्रदायिक बनाने की जी तोड़ कोशिश की जा रही है जबकि राजनीति में हिंसा का कोई स्थान नहीं माना गया है। यहां पर अभी 9 लोकसभा सीटों का चुनाव होना बाकी है जिन पर फतह पाने के लिए सारे राजनैतिक हथकंडे अपनाये जा रहे हैं। भाजपा जहां उत्तर प्रदेश में होने वाली अपनी संभावित क्षति की पूर्ति  करने का प्रयास कर रही है तो वही सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस अपने अभेद किले को बचाने में जुटी है यही कारण है कि यहां का चुनावी माहौल रोजाना संवैधानिक दायरे से दूर भागता जा रहा है।

स्थिति यह हो गई है कि भाजपा के राजनीतिक हमले से आहत तृणमूल कांग्रेस तथा उसकी नेता ममता दीदी  की जुबान बदजुबान होती जा रही है और वह अपनी बौखलाहट में जो भी जुबान में पर आता है उसे बोलती जा रही हैं।यहाँ की चुनावी  स्थिति  यहां तक पहुंच गई है कि यहाँ की मुख्यमंत्री  वर्तमान प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री तक मानने को तैयार नहीं हो रही है और उन्हें गुंडा बदमाश कहकर उनकी आलोचना कर रही है। फलस्वरूप तृणमूल कांग्रेस एवं भाजपा दोनों एक दूसरे के खून के प्यासे होते जा रहे हैं। 

अभी कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई में कोलकाता में निकाली गई रैली के दौरान इस कदर हिंसा हुई कि रैली को बीच में ही रोक देना पड़ा है।इस घटना के लिए तृणमूल कांग्रेस एवं भाजपा दोनों एक दूसरे को आरोपित कर रहे हैं। राजनीति में सत्ता तक पहुंचने के लिए जातीय एवं सांप्रदायिक हिंसा का सहारा लेना लोकतंत्र के हित में कतई नहीं कहा जा सकता है।

  भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी

Support to Swatantra Prabhat Media

T & C Privacy

Comments