बसी हो बस्ती अगर जो बहुत घनी, तो घरों में सबके उजाले नहीं आते...

बसी हो बस्ती अगर जो बहुत घनी, तो घरों में सबके उजाले नहीं आते...

बसी हो बस्ती अगर जो बहुत घनी
तो घरों में सबके उजाले नहीं आते,
मजबूर कर दे कभी मसरूफियत, कहीं मुफलिसी
गरीब तो गरीब ही ठहरे ,अमीरों से भी 
बच्चे अब पाले नहीं जाते!


बनवायें टेस्ट ट्यूब में, बढ़ें तो किराये की कोख 
आधुनिक मां से अब दर्द ,सम्हाले नहीं जाते!

जो समर्थ हैं ,और पाल सकते हैं कई को
वो एक या कोई भी बच्चा नही करते,
जो हैं मोहताज और सड़कों पे हैं रहते
सात आठ पैदा करने से भी नहीं डरते,


आ जाता है एक नया मुँह हर साल बस यूं ही
उनके घर जहाँ,आंतो में रोज निवाले नहीं जाते!

घर के पौधों को जो खुद न दे पानी
फूल सूखे जो ,तो वो माली से झगड़ जाते हैं
अपने ही घर ना खिला सकें औलादों को रोटी
अस्पताल जा के , उनकी दवाई पे अकड़ जाते हैं,
जिनपे विश्वास करें, वो भी न जाने क्या कर दें!
आज बच्चों को छोड़ ,पड़ोसी के हवाले नहीं जाते!

 

हर बच्चे को एक बेहतर दुनिया ,इसमें क्या कोई शक है,
जो कुछ ना कर पाये ,उसे उनको लाने का क्या हक है
वैसे तो देश ,समाज के लिए बच्चों से प्यार ज़रूरी है
पैदा तो करें ,पर पाल ना पायें उनका धिक्कार ज़रूरी है
जरूरत से ज्यादा भरोगे तो ,फट जायेगा दामन
औलाद हो चाहे फूल हो,फिर तो सम्हाले नहीं जाते!

समाचारों की दुनिया ,उनकी ये मजबूरी है


मिल जायें कैसे विज्ञापन, ये सच से ज्यादा जरूरी है
इसलिए अस्पताल जा के ,डॉक्टरों पे चिल्लाते हैं
कोई इंतजाम ठीक नहीं, उन पे इल्ज़ाम लगाते हैं
मगर मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री मिल जाये तो पूंछ लें
कि आम लगे कैसा ,बाकी मुद्दे ,वो तो उछाले नहीं जाते!

 

आने के लिए क्या अनुरोध किया था
फिर पैदा जो किया ,तो कोई एहसान नहीं
खूबी ,गलती का पुतला वो भी
कोई एक परम इंसान नहीं


बच्चा ,बच्चा ही है,कोई डिब्बा नहीं है जादू का
छड़ी हिलाकर उससे ,अरमान अधूरे निकाले नहीं जाते!

 

posted by Dr sandeep agrawal

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