चल रहा है रमज़ान के मगफिरत का अशरा/दहाई, फ़र्ज़ को अदा कर पा लें जहन्नम से निजात

चल रहा है रमज़ान के मगफिरत का अशरा/दहाई, फ़र्ज़ को अदा कर पा लें जहन्नम से निजात

ध्यानपूर्वक करें ज़कात और सदकाए-फित्र (दान) अदा

दूसरे देशों में कमाई करने वाले उस देश के हिसाब से निकालें सदकाए-फित् 

जमुई:-बिहार 

इस्लाम एक पाक और। साफ धर्म है जिसके सर्वोसर्वा मोहम्मद सल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं।रसूल की बताई हुई हर एक चीज़ को हदीस कहा जाता है और आसमान से उतरी हुई किताब को कुरआन कहा जाता है।

कुरआन और हदीस को नहीं मानने वाला इस्लाम से खारिज है।रमज़ान के महीने को तीन अशरा यानी तान दहाई में बंटा गया है।पहला 01 से 10 रमज़ान रहमत,दूसरा 11 से 20 रमज़ान मगफिरत और तीसरा 21 से 30 रमज़ान जहन्नम से निजात का है।वहीं अल्पसंख्यक के जिलाध्यक्ष सह बिहार राजपत्रित शिक्षक संघ के जिला प्रवक्ता मो.हिफजुर रहमान ने बताया कि हम सभी मुसलमान रमज़ान के दूसरे अशरे यानी मगफिरत के अशरे में चल रहे हैं।

 

हिफजुर रहमान ने बताया कि मगफिरत का तरीका जो इस्लाम ने बताया है वो रोज़ा,नामाज़ और तरावीह के अलावा ज़कात और सदकाए-फित्र का भी बड़ा अहम रॉल है।इसलिए खास तौर पर उनलोगों से अपील है जो साहेबे माल यानी ज़कात के दायरे में आते हों उसे पाबंदी के साथ सोना,चांदी,रुपया आदि का हिसाब कर ज़कात और सदकाए-फित्र निकालें।जो बंदा हिंदुस्तान में रहता हो वो हिंदुस्तान के हिसाब से सदकाए- फित्र निकालें।और जो हिंदुस्तान से बाहर कमाई कर रहा हो

वो वहाँ के हिसाब से सदकाए फित्र निकालें।जैसा कि इमारते-शरिया बिहार उड़ीसा ने एलान किया है।हर आदमी 40 रुपया के हिसाब से सदकाए-फित्र निकाले और 33हज़ार रुपये तोला के हिसाब से सोने का दाम जोड़कर ज़कात निकाले।वहीं चांदी के एक तोले पर 10 रुपये के हिसाब से निकालें।साथ ही ये भी ख्याल रहे कि ज़कात और सदकाए-फित्र के माल को सबसे पहले अपने रिश्तेदार में दें जो उस लायक गरीब हों।उसके बाद दोस्त,पड़ोस गरीब व मदरसा में दें।लेकिन यह भी ख्याल रहे कि यह पैसा मदरसे के निर्माण कार्य मे नहीं लगनी चाहिए।

आज के दौर में इंसान इतनी गफलत में जी रहा है कि जैसे उसे मौत आएगी ही नहीं।गरीब,मिस्कीन और यतीम को सदका,ज़कात देना अल्लाह ने दौलतमंद लोगों पर फर्ज कर दिया है इसके बावजूद इंसान दुनिया की ज़िंदगी मे उलझ कर  गलती कर बैठता है।और घर पर आये मांगने वालों को डांट-फटकार कर भगा दिया जाता है।जो बिल्कुल गलत है।ऐसा नहीं करना चाहिये जिससे अल्लाह नाराज हो।हमलोग ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं कि आये दिन कितने लोग फ़र्ज़ को मुकम्मल तरीके से अदा नहीं करते।"अपनी मर्ज़ी से दुनिया में जिंदा हैं लोग,लग रहा है ज़मीन पर खुदा ही नहीं।

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