बूढ़ी माँ

बूढ़ी माँ

आज चेत्र मास का पहला नवरात्रा है।

शैल माँ के  नाम से जाने जाना वाला नवरात्रा।

इसे ही नवरात्रि का शुभारंभ कहा जाता है।

मिश्राजी को आज के दिन कार्यालय जाने के लिए घर से ही विलम्ब हो गया। 

बावजूद इसके मिश्राजी इस दिन बड़ी रफ्तार से कार्यालय की तरफ बस पकड़ने  के लिय दौड़े चले जा रहे थे। उनको यह चिंता सता रही थी. कहीं देर ना हो जाए. हालांकि वह लगभग डेढ़ किलोमीटर प्रतिदिन पद  यात्रा बड़ी तेजी के साथ पूर्ण करते है।

शर्मा जी जो उनके लँगोटिया यार है,वह अक्सर मिश्राजी को कहते है।

आपने मैराथन में कभी भाग नहीं लिया, वरना मैराथन के विजेता निश्चित  आप ही होते। 

पांडे जी ने भी उनकी बात  में हामी भरते हुए कहा।

 मिश्राजी बचपन से ही तेज चलने के लिय जाने जाते है।

वे सब जैसे ही राजापूरी बस स्टैण्ड पर पहुंचे। 

उनका मन बर्फ की तरह जो कठोर था,वह उस घटना को देखकर पिघलने लगा।

बूढ़ी माँ बार बार अपने रूमाल को खोले और फिर बंद कर ले। 

वह बार बार कह रही थी,उन्होंने दस रुपय में रिक्शा मुकर्रर की थी। 

मिश्राजी कुछ समझ नहीं पा रहे थे,आखिर यह क्या माजरा है? 

वह बूढ़ी माँ मिश्राजी से बोली 20 रुपय का खुल्ला दे दो।

मिश्राजी ने अपना तेज दिमाग दौड़ा दिया।

उन्होंने मन ही मन में सोचा सारा झगड़ा 10 रुपय के छुट्टा ना होने के कारण विवाद हो रहा है।

शर्मा जी ने अपनी जेब से 10 रुपए निकाल कर रिक्शा चालक को जैसे ही दि।

वह बोला बाउजी हमने इन्हें बताया था।

वहा का किराया 30 रुपय है. परंतु वह बोली 20 रुपए दूँगी।

मैंने कहा खाली जाने से अच्छा है. कुछ तो आमदनी होगी. 20 रुपय ही क्यु ना कमा लिय जाए।

लेकिन अब यह कह रही है,मैं 10 रुपय ही दूँगी,क्युकी मेरे पास मात्र 20 रुपय है।

वह कह रही है. 10 रुपय मुझे पहले दो. तभी मैं 20 रुपय दूँगी।

हमने रिक्शा वाले से कहा भाई वह जब कह रही है.  रिक्शा 10 रुपय में तय हुआ था. फिर आप क्यु 20 रुपय मांग रहे हो।

वह इतनी उम्रदराज है, वह क्यूकर झूठ बोलेँगि।

 

वह बोला भाईसाहब रोजी रोटी की कसम खा कर कहता हू।

 

रिक्शा 20 रुपय में तय हुआ था।

 

मिश्राजी ने अपनी जेब से 20 रुपय निकाल कर रिक्शा चालक को दे दिए।

 

तभी मिश्राजी की बस भी आ पहुंची।वह उसमें बैठ गय. उनके पीछे पीछे वह बूढ़ी माँ भी बैठ गई।

 

वह मिश्राजी से बोली ये लोग बड़े बदतमीज होते है,

 

पहले कुछ कहते है, बाद में कुछ और मांगने लगते है।

 

मिश्राजी ने भी कहा माँ समय गुजर चुका है।

 

 किसने किससे क्या कहा. बेकार है सब कुछ।

 

अब वर्तमान का मजा लीजिए।

 

वह लगातार उसी विषय में बात करना चाह रही थी।

 

परंतु मिश्राजी अपने कार्यालय पहुंचने के लिय बेताब थे।

 

उनका मन किसी भी बात को इस वक्त सुनने को तैयार नहीं था।

 

वह पुनः बोली आपका धन्यवाद जो आपने पैसे दिय।

 

मिश्राजी ने कहा माँ आप धन्यवाद कहकर हमें शर्मिंदा ना करें।

 

यह जीवन है, कौन कब किसके काम आ जाए।

 

 कुछ नहीं कहा जा सकता।

 

वह थोड़ी दूर जाने के बाद सोच विचार कर पुनः बोली।

 

बेटा 5 रुपय और दे दोगे।

 

 मिश्राजी ने बड़े नम्र भाव से कहा माँ मेरे पास मात्र 5 रुपय खुले है. वह भी इन्हें देने है।

 

माफ कीजिएगा जो छुट्टें पैसे थे,वह समाप्त हो गय। 

 

मिश्राजी अपने बस स्टैण्ड पर उतर गय।

 

वह माँ को तब तक देखते रहे. जब तक वह बस उनके आँखों से ओझल ना हो गई। 

 

वह सोच में थे आखिर बूढ़ी माँ ने क्यूकर 5 रुपय और मांगे होंगे।

 

यह सोचते सोचते मिश्राजी अपने कार्यालय की दिनचर्या में व्यस्त हो गय।

 

मिश्राजी का यह पहला नवरात्रा बूढ़ी माँ के साथ कुछ इस प्रकार बना।

 

जय हो शैल माँ की।

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