बड़े कारोबारियों के पैसों ने डुबोया देश का लोकतंत्र

बड़े कारोबारियों के पैसों ने डुबोया देश का लोकतंत्र

नेशनल और इंटरनेशनल कंपनियां या बड़े औद्योगिक घरानों के पैसों की वजह से लोकतंत्र आज तबाह होता नजर आ रहा है.

वैसे भी काफी दिनों से सोशल मीडिया और बुद्धिजीवियों की मानें तो कॉरपोरेट जगत ने हिंदुस्तान की जनता की आवाज गुमराह करने का ऐसा बीड़ा उठा लिया है मानो लोकतंत्र देश में रह ही नहीं गई है.हिंदुस्तान के बेरोजगार युवा रोजाना डेढ़ जीबी डाटा प्राप्त कर बिन पैसों के मांनो रोजगार प्राप्त कर चुके हैं वही लोकतंत्र की गला घोटने वालों को एक मौका मिल चुका है.

पूरे दिन ब्रांडिंग और मार्केटिंग की वजह से हम अपनी बुनियादी जरूरतों से कोसों दूर हो चुके हैं कारपोरेट जगत इतना हावी हो चुका है कि आम जनता को जैसे चाहे वैसे घुमा ले रहा है.

औद्योगिक घराने अपने आप को बचाने के लिए चुनाव में इतना पैसा झोक दे रही जिसमें मीडिया अपनी मूल से हटकर लोकतंत्र के अच्छे बुरे की अनदेखी करते हुए कुछ भी दिखाने और फैलाने में लगी हुई है.

जिसका हमारे आम जीवन में काफी बड़ा फर्क देखने को मिल रहा है देश सब कुछ जानते हुए उन्हीं प्रोपेगंडा और झूठी खबरों को लेकर अच्छे बुरे में फर्क नहीं कर पा रहा जिसका सीधा प्रभाव प्रधानमंत्री जैसे पद पर देखा जा सकता है.

मतलब साफ है बुद्धिजीवी वर्ग तो नहीं लेकिन समाज का एक बड़ा तबका कारपोरेट जगत के दिग्गजों और मीडिया के दुष्प्रचार में फंसकर लोकतंत्र में दिए अपने पावर का खुद से गला घोट ऐसे व्यक्ति विशेष को अपने करीब उठा लेता है जिससे पल्ला झाड़ना इतना आसान भी नहीं होता. पहले और अब के लोकतंत्र में जो फर्क साफ देखा जा सकता है

कुछ चंद मुट्ठी भर लोगों की वजह से सवा सौ करोड़ लोग रोजाना पीछे जा रहे हैं आवाज उठाने पर गलत शक्तियों का हावी होना भी साफ देखा जा सकता है.

पहले राजनीति करने वाले जनता के मुद्दों पर तालमेल बिठा चुनाव लड़ते और बहुमत पाने वाली पार्टी के नेता सर्वोच्च पद पर आसीन होकर जनता की बातों को देश और दुनिया तक पहुंचाते थे. लेकिन आज के दौर में कॉर्पोरेट जगत के मुट्ठी भर लोग अपने पैसों की ताकत से चुनाव को प्रभावित कर अपने मन मुताबिक नेता और पद का दुरुपयोग करवाते हुए शासन सत्ता चला रहे है. जिसे हम समझते हुए भी अंजान बने रहते हैं यही वह कारण है जो लोकतंत्र का वजूद राजतंत्र में बदलता हुआ दिख रहा है और देश की जनता चाह कर भी इसका विरोध नहीं कर पा रही है.

हिंदुस्तान के जितने भी पूंजीपति वर्ग हैं वह जनता की कमजोरियों का नाजायज फायदा उठाते हुए अपने को फायदा पहुंचाने वाली सिर्फ सरकार बनाना चाहते हैं. इसके लिए वे लगातार गुमराह करने वाली विज्ञापन और खबरों को जनता तक अपने पैसों की बदौलत पहुंचाकर लोकतंत्र की नीव हिलाने की अमिट कोशिश कर रहे हैं जिसका परिणाम लगातार देखा जा सकता है. देश का युवा भी इन की चकाचौंध भरी विज्ञापनों और खबरों को सच मान सोशल मीडिया पर फैलाने में लग जाता है जिसकी वजह से मुद्दा नगण्य और प्रोपेगंडा देश पर हावी होता जा रहा है और यही कारण है देश में लोकतंत्र कमजोर होता नजर आ रहा है. 

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