दीपावली किसलिये, कब, क्यों और कैसे मनाई जाती है? इसके पीछे का क्या है इतिहास, जानिये पूरा

दीपावली किसलिये, कब, क्यों और कैसे मनाई जाती है? इसके पीछे का क्या है इतिहास, जानिये पूरा

सुरेन्द्र गिल -

दीपावली सबसे बड़े त्योहारों में से एक है। यह त्योहार पांच दिनों तक चलने वाला सबसे बड़ा पर्व होता है। इस त्योहार का बच्चों और बड़ों को पूरे साल इंतजार रहता है। कई दिनों पहले से ही इस उत्सव को मनाने की तैयारियां शुरू हो जाती है।

इस दिन भगवान श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण चैदह वर्ष का वनवास पूरा करके अपने घर अयोध्या लौटे थे। इतने सालों बाद घर लौटने की खुशी में सभी अयोध्यावासियों ने दीपक जलाकर उनका भव्य स्वागत किया था। तभी से दीपों के त्योहार को दीपावली मनाया जाने लगा।


दीप जलाने की प्रथा के पीछे अलग-अलग कारण या कहानियां हैं। हिंदू मान्यताओं में राम भक्तों के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्री रामचंद्र जी चैदह वर्ष का वनवास काटकर तथा असुरी वृत्तियों के प्रतीक रावण आदि का संहार करके अयोध्या वापिस लौटे थे।
 
तब अयोध्यावासियों ने राम के राज्यारोहण पर दीपमालाएं जलाकर महोत्सव मनाया था। इसीलिए दीपावली हिंदुओं के प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर का वध किया था।

इस नृशंस राक्षस के वध से जनता में अपार हर्ष फैल गया और प्रसन्नता से भरे लोगों ने घी के दीप जलाए। एक पौराणिक कथा के अनुसार विंष्णु ने नरसिंह रुप धारण करके हिरण्यकश्यप का वध किया था तथा इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात लक्ष्मी व धन्वंतरि प्रकट हुए थे।
 
नेपाल के लोगो के लिए यह त्योहार इसलिए महान है क्योंकि इस दिन से नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है। पंजाब में जन्मे स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन ही हुआ। इन्होंने दीपावली के दिन गंगा तट पर स्नान करते समय श्ओमश् कहते हुए समाधि ले ली। महर्षि दयानंद ने भारतीय संस्कृति के महान जननायक बनकर दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया। इन्होंने आर्य समाज की स्थापना की।
 
जैन मतावलंबियों के अनुसार चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी दीपावली को ही है। सिक्खों के लिए भी दीवाली महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ही अमृतसर में 1577 में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। इसके अलावा 1619 में दीपावली के दिन सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को जेल से रिहा किया गया था।

 
ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात्रि अर्थात अर्धरात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक में आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुंदर तरीके से सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है वहां अंश रूप में ठहर जाती हैं और गंदे स्थानों की तरफ देखती भी नहीं। 
यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। अमावस्या की अंधेरी रात होने की वजह से जगमग असंख्य दीपों से जगमगाने लगती है। यह त्योहार लगभग सभी धर्म के लोग मनाते हैं। इस त्योहार के आने के कई दिन पहले से ही घरों की लिपाई-पुताई व सजावट का काम प्रारंभ हो जाता है। इन दिन पहनने के लिए नए कपड़े बनवाए जाते हैं, मिठाइयां बनाई जाती हैं। इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है इसलिए उनके आगमन और स्वागत के लिए घरों को सजाया जाता है।


यह त्योहार पांच दिनों तक मनाया जाता है। धनतेरस से भाई दूज तक यह त्योहार चलता है। धनतेरस के दिन व्यापारी लोग अपने नए बही खाते बनाते हैं। अगले दिन नरक चैदस के दिन सूर्योदय से पूर्व स्नान करना अच्‍छा माना जाता है। अमावस्या यानी कि दिपावली का मुख्य दिन, इस दिन लक्ष्मीजी की पूजा की जाती है।

खील-बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। नए कपड़े पहने जाते हैं। फुलझड़ी, पटाखे छोड़े जाते हैं। दुकानों, बाजारों और घरों की सजावट दर्शनीय रहती है। अगला दिन परस्पर भेंट का दिन होता है। एक-दूसरे के गले लगकर दीपावली की शुभकामनाएं दी जाती हैं। लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का भेद भूलकर आपस में मिल-जुलकर यह त्योहार मनाते हैं।


दीपावली का त्योहार सभी के जीवन को खुशी प्रदान करता है। नया जीवन जीने का उत्साह प्रदान करता है। कुछ लोग इस दिन जुआ खेलते हैं, जो घर व समाज के लिए बड़ी बुरी बात है। हमें इस बुराई से बचना चाहिए। पटाखे सावधानीपूर्वक छोड़ने चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि हमारे किसी भी कार्य एवं व्यवहार से किसी को भी दुख न पहुंचे, तभी दीपावली का त्योहार मनाना सार्थक होगा।
दीपावली के त्योहार का मनुष्य जीवन में विशेष महत्व है । लोग त्योहार के उपलक्ष्य में अपने घर की पूरी तरह सफाई करते हैं जिससे कीड़े-मकोड़ों व अन्य रोगों की संभावना कम होती है । महीनों की थकान भरी दिनचर्या से अलग लोगों में उत्साह, उल्लास व नवीनता का संचार होता है ।

परंतु इस त्योहार की दुर्भाग्यपूर्ण विडंबना यह है कि लक्ष्मी के आगमन के बहाने लोग जुए जैसी राक्षसी प्रवृत्ति को अपनाते हैं जिसमें कभी-कभी परिवार के परिवार बर्बाद हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त दिखावे के चलते लोग इन त्योहारों पर जरूरत से ज्यादा खर्च करते हैं जो भविष्य में अनेक परेशानियों का कारण बनता है ।

अधिक धुआँ छोड़ने वाले तथा भयंकर शोर करने वाले पटाखों को छोड़कर खुश होने की घातक परंपरा को भी अब विराम देने की आवश्यकता है । हम सबका यह नैतिक कर्तव्य है कि हम इन कुरीतियों से स्वयं को दूर रखें ताकि इस महान पर्व की गरिमा युग-युगांतर तक बनी रहे ।

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