वन्य जीवसंरक्षण में गैर.संरक्षित क्षेत्र भी हो सकते हैं मददगार

वन्य जीवसंरक्षण में गैर.संरक्षित क्षेत्र भी हो सकते हैं मददगार

नई दिल्ली15 अप्रैल ;इंडिया साइंस वायर  भारत में वन्य जीवों का संरक्षण और प्रबंधन मुख्य रूप से राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों में केंद्रित है। हालांकिएकई गैर.संरक्षित क्षेत्र भी वन्यजीवों के संरक्षण में उपयोगी हो सकते हैं। एक ताजा अध्ययन में संरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों के बाहर तेंदुएए भेड़िये और लकड़बग्घे जैसे जीवों में स्थानीय लोगों के साथ सह.अस्तित्व की संभावना को देखकर भारतीय शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। 

इस अध्ययन में महाराष्ट्र के 89 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र मेंफैली अर्द्धशुष्क भूमियोंए कृषि क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों का सर्वेक्षण किया गया है। वन विभाग के कर्मचारियों के साक्षात्कार और सांख्यकीय विश्लेषण के आधार पर भेड़ियोंए तेंदुओं और लकड़बग्घों के वितरण का आकलन किया गया है।इस भूक्षेत्र के 57 प्रतिशत हिस्से में तेंदुएए 64 प्रतिशत में भेड़िये और 75 प्रतिशत में लकड़बग्घे फैले हुए हैं। जबकिए अध्ययन क्षेत्र में सिर्फ तीन प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र शामिल है।


शोधकर्ताओं का कहना है कि कृषि भूमि उपयोगए निर्माण क्षेत्रए पालतू जीव और शिकार योग्य वन्यजीवों की प्रजातियों की मौजूदगी इन तीनों वन्य जीवों के वितरण के पैटर्न को प्रभावित करती है।
प्रमुख शोधकर्ता इरावती माजगांवकर ने बताया कि श्यह अध्ययन बड़े मांसाहारी वन्यजीवों के संरक्षण के लिए निर्धारित संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के इलाकों के महत्व को दर्शाता है। ऐसे इलाकों में जीवों के सह.अस्तित्व की घटना नई नहीं हैए जहां मानव आबादी करीब एक हजार वर्षों से मौजूद है। हालांकिए भारत में जंगल तथा मानव क्षेत्रों को अलग करना एक सामान्य प्रशासनिक मॉडल हैए जो संरक्षित क्षेत्रों के बाहर इन्सानों और वन्यजीवों के मुद्दों से निपटने के लिए उपयुक्त नहीं है। इसलिए मनुष्य और वन्यजीवों द्वारा साझा किए जाने वाले क्षेत्रों पर भी ध्यान केंद्रित किए जाने की जरूरत है।श्
 
अध्ययन क्षेत्र के 57 प्रतिशत हिस्से में फैले हुए हैं तेंदुएं  रमकी श्रीनिवासन
वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी.इंडियाए फ्लोरिडा यूनिवर्सिटीए सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज और महाराष्ट्र वन विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह अध्ययन शोध पत्रिका कंजर्वेशन साइंस ऐंड प्रैक्टिस में प्रकाशित किया गया है।शोधकर्ताओं का कहना है कि भूमि.उपयोग प्रथाओं में परिवर्तनए जैसे. कृषि क्षेत्रों का विस्तार और सिंचाई प्रणालियों के प्रसार का असर इन वन्यजीवों पर पड़ सकता है। इसलिएए वर्तमान संरक्षण नीतियों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है ताकि मानवीय क्षेत्रों को संरक्षण आवास के रूप में पहचाना जा सकेए जहां स्थानीय लोग और शिकारी जीवों के बीच अनुकूलन और सह.अस्तित्व कायम रखा जा सके।

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओ में वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी की इरावती माजगांवकरए श्वेता शिवकुमारए अर्जुन श्रीवत्स एवं विद्या आत्रेयएफाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल रिसर्च एडवोकेसी ऐंड लर्निंग के श्रीनिवास वैद्यनाथनऔर महाराष्ट्र वन विभाग के सुनील लिमये शामिल थे। यह अध्ययन रफर्ड स्मॉल ग्रांट फाउंडेशन और महाराष्ट्र वन विभाग के अनुदान पर आधारित है।
 

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