दिल्ली में सार्क की वार्षिक कान्फ्रेंस का उद्घाटन हुआ

 दिल्ली में सार्क की वार्षिक कान्फ्रेंस का उद्घाटन हुआ

सार्क देशों से अग्रणी एंडोक्राइनोलॉजिस्टों की एक टीम ने शहर  में  वार्षिक  ‘सार्क  डायबटीज  कान्फ्रेंस’  का  उद्घाटन  किया।  इस  साल  की  कॉन्फ्रेंस  की थीम  ‘शरीरमाद्यं खलु  धर्मसाधनम’  है,  जो  शरीर  को सेहतमंद रखने के  लिए  व्यक्तिगत दायित्व पर  बल  देती  है। 

यह  दो  दिवसीय  कान्फ्रेंस  सर  गंगाराम  अस्पताल  के  एंडोक्राइनोलॉजी  और मेटाबोलिज़्म विभाग के तहत आयोजित हुई। यह अकेला मंच है जिस पर सार्क देशों के  प्रमुख डॉक्टर  एकत्रित  होते  हैं  और  इलाज  के  बेहतर  तरीके  साझा  करते  हैं,  आधुनिकतम  उत्पादों  व तकनीकी प्रगतियों के बारे में जानकारी देते हैं, ताकि मधुमेह का बेहतर नियंत्रण हो सके।


इसका  उद्घाटन  सार्क  मधुमेह  एसोसिएशन  के  प्रेसिडेंट,  प्रो.  (कर्नल)  सुरेंद्र  कुमार  ने  किया। कॉन्फ्रेंस  में  देशभर  प्रमुख  एंडोक्राइनोलॉजिस्टों  ने  हिस्सा  लिया,  जिनमें  डॉक्टर  वी  मोहन, डॉक्टर निखिल टंडन और डॉक्टर अंबरीश  मित्तल खास हैं। इसमें एक  जैसी सोच रखने वाले हितधारकों  और  सार्क  देशों  के  डॉक्टरों  ने  हिस्सा  लिया। 

इन  लोगों  ने  मधुमेह  से  निपटने  के लिए  अपने-अपने  क्षेत्रों  में  शुरू  किए  गए  जागरूकता  अभियानों  की  मदद  से  मधुमेह  नियंत्रित करने  पर  प्रकाश  डाला।  प्रो.  (कर्नल)  सुरेंद्र  कुमार,  चेयरमैन,  एंडोक्राइनोलॉजी  एवं  मेटाबोलिज़्म विभाग, 

सर गंगाराम  हॉस्पिटल  ने कहा,  ‘‘सबसे  ज्यादा  मधुमेह  पीड़ित लोगों की  आबादी  सार्क देशों में है। इस कान्फ्रेंस की बदौलत हम अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, वर्तमान में मधुमेह को नियंत्रित करने के तरीके की प्रक्रिया और विकास पर चर्चा कर रहे  हैं।

भारत में खासतौर पर ‘इंपैक्ट इंडिया, द 1000-डे चैलेंज’ के तहत स्पष्ट लक्ष्य  व दिशानिर्देश निर्धारित किए  गए  हैं।  इसके  तहत  मधुमेह  की  बेहतर  ढंग  से  देखभाल  कर  अगले  तीन  साल  में एचबीए1सी  के  स्तर  को  एक  फीसदी  घटाना  है।  यह  बुनियादी  प्रोग्राम  है  जो  अन्य  देशों  का मार्गदर्शन कर सकता है जिससे अन्य देश भी सीख सकते हैं।’’


आईडीएफ  मधुमेह  एटलस  के  आठवें  संस्करण  के  अनुसार,  2017  में  दक्षिण  पूर्व  के  देशों  में मधुमेह से पीड़ित लोगों की संख्या 82 मिलियन से अधिक थी। आशंका यह व्यक्त की जा रही है  कि  2045  तक  इनकी  संख्या  बढ़कर  151  मिलियन  से  अधिक  हो  जाएगी।  यह  तथ्य  स्पष्ट रूप  से  दर्शाता  है  कि  दुनियाभर में मधुमेह  से पीडित लोगों  की  जनसंख्या  निरंतर बढ़  रही  है। इसका मुख्य कारण लोगों की गतिहीन जीवनशैली और इसके लक्षणों को नजरंदाज करना है।

भारतीय  उपमहाद्वीप  में  खासतौर  पर  मधुमेह  के  मरीजों  की  संख्या  अधिक  होने  के  कारण स्वास्थ्य  सेवाओं  पर  अधिक  दबाव  पड़ता  है।  इस  समस्या  के  प्रति  जागरूकता  का  अभाव  और मधुमेह  का  पता  नहीं  लगने  के  कारण  हृदय,  गुर्दे,  आंख  और  शरीर  के  अन्य  कई  अंगों  में बीमारियों की शुरुआत हो जाती है। डॉक्टर सुधीर त्रिपाठी, सीनियर कंसल्टैंट, एंडोक्राइनोलॉजी एवं  मेटाबोलिज़्म  विभाग,  सर  गंगा  राम  हॉस्पिटल  ने  कहा, 

‘‘अकेले  भारत  में  ही  हर  12  में  से एक  वयस्क  मधुमेह  से  पीड़ित  है  और  11.2  लाख  से  अधिक  लोग  इससे  होने  वाली  अन्य परेशानियों  का  शिकार  हो  जाते  हैं।  इस  बढ़ती  हुई  समस्या  से  निपटने  के  लिए  समय  की जरूरत यह है कि  इन भ्रांतियों को तोड़ा जाए  और  मधुमेह के इलाज की जागरूकता बढ़ाकर हम स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं और जागरुक बनें।’’

 

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