काशी के डोमराजा आर्थिक स्थिति में काशी के ब्राह्मणों से बेहतर

काशी के डोमराजा आर्थिक स्थिति में काशी के ब्राह्मणों से बेहतर

वाराणसी:

लोकसभा 2019 का चुनाव और धार्मिक भावनाओं से ना जुड़े यह तो हो ही नहीं सकता. हम और आप बेशक ना चाहे लेकिन पार्टियां इसे अपने पक्ष में भुनाने से पीछे नहीं हटती. काशी से जिस तरह प्रस्तावक के रूप में जगदीश चौधरी डोम राजा को बीजेपी ने लोगों के सामने पेश किया और आर्थिक बदहाली का ढिंढोरा पीटते हुए 600 डोमराजाओं की बात काशी के घाटों से जोड़ते हुए बताया. लेकिन उनकी वास्तविक स्थिति कुछ और ही है जिसे जानना आपके लिए अत्यंत आवश्यक भी है.

बनारस के ब्राह्मणों ने पेड मीडिया का जिक्र करते हुए वास्तविक स्थिति को छुपाने का दावा और नाम ना बताने की शर्त पर कहा कि डोम राजा से यहां के ब्राह्मणों की आर्थिक स्थिति बहुत ही दयनीय है लेकिन रहन-सहन लोक लाज की वजह से ब्राह्मण समाज काशी में कुछ कहने से बचता है.काशी की मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर जितने भी डोम राजा हैं

वह आर्थिक स्थिति से काफी मजबूत और वही ब्राह्मणों की स्थिति काफी दयनीय है. लेकिन कोई भी सरकार किसी भी हालत में यहां मुंह खोलने और मदद करने के लिए तैयार नहीं होती. उसके पीछे वोट की राजनीति से लेकर कई कारण है जो शायद मैं भी खबर से प्रकाशित नहीं कर सकता बहरहाल यह जरूर कह सकता हूं कि वहां के ब्राह्मण भी डोम राजाओं पर निर्भर है.

विश्व प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट

हजारों साल से काशी के घाट विश्व प्रसिद्ध है पौराणिक मान्यता के अनुसार मृतक को सीधा मोक्ष के द्वार पहुंचाने का एक सुगम रास्ता भी माना जाता है. वैसे तो हिंदू मान्यताओं के अनुसार इन घाटों को सतयुग से जोड़कर देखा जाता है. जहां माता पार्वती के कर्ण फूल यहां के कुंड में गिरने और भगवान शिव के द्वारा ढूंढने की वजह से मणिकर्णिका और दूसरी मान्यता के अनुसार माता पार्वती के पार्थिव शरीर का अग्नि संस्कार करने की वजह से महासमसान मणिकर्णिका नाम से जाना जाने लगा है.

जबकि हरिश्चंद्र घाट काशी के राजा हरिश्चंद्र के पुत्र के स्वप्न में मरणोपरांत राजपाठ डोम राजा को दान कर कफ़न और साढे 3 फुट जमीन लेने की कहानी सदियों से चली आ रही जहां राजा हरिश्चंद्र ने बाकी की जिंदगी घाट पर चौकीदारी कर गुजारी. 

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भारत के कोने-कोने से हजारों हजार की संख्या में लोग यहां अपने मृतक के पार्थिव शरीर को लेकर पहुंचते हैं. मरणोपरांत अग्नि संस्कार कर मोक्ष के सीधे द्वार पहुंचाने की मान्यता ने काशी के इन घाटों का महत्व और भी बढ़ा रखा है. जहां कई प्रांत और जिले के लोग श्रद्धा भक्ति से अपने पूर्वजों के अस्थि विसर्जन वास्ते गंगा के इन घाटों पर बड़े भारी तादाद पर पहुंचते हैं.

और यहां उनकी मुलाकात इन डोम राजाओं से होती है. जो पार्थिव शरीर को अग्नि के हवाले करने और जगह देने के नाम पर मुंह मांगी कीमत मृतक के परिजनों से प्राप्त करते हैं और मनमाने ढंग से दो-चार मिनट के लिए ब्राह्मणों को पूजन विधि के लिए बुलाते हैं और मन नहीं हुआ तो इसकी जरूरत भी नहीं समझते और उनके हिस्से की रकम भी गोल मोल कर देते हैं जिसकी वजह से यहां ब्राह्मणों की माली हालात और भी बदतर समझी जा सकती है.

यहां के स्थानीय लोगों के बताने और मेरा अपना खुद का अनुभव भी इन घाटों से रहा है जो काफी हद तक ब्राह्मणों के कथनानुसार सत्य भी है. एक लाश किसी भी हालत में पहुंचे उस पर काशी के राजाओं यानी डोम राजाओं का अपना मनमानी ही चलता है और मुंह मांगे कीमत देने पर ही उनकी चिंताओं को अग्नि दी जा सकती है. अन्यथा उन्हें सैकड़ों लाशों के जलने के बाद ही समय दिया जाता है. 2500 से 20000 तक की कीमत मृतक के परिजनों को चुकाना पड़ता है और पैसे को लेकर आना कानी हुई

तो अर्ध जले चिता छोड़ने की धमकियां भी मिलने लगती है. पूरे दिन और रात यानी 24 घंटे यह घाट लाशों से भरा रहता है जहां हजारों की संख्या में लासे जलते देखी जा सकती है. इससे यहां के डोम राजाओं की आर्थिक स्थिति का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं लेकिन धार्मिक भावना आहत ना हो इस वजह से कोई इनका विरोध नहीं करता यही वहां के ब्राह्मण भी अपनी आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद उनको जवाब नहीं दे पाते हैं. 

खैर राजनीतिक गलियारों से धार्मिक चीजों को जोड़ते हुए नाम कमाना हमारे मोदी जी को बहुत खूब आता है और शायद इसी क्रम में वह अपने प्रस्तावक भी डोम राजा यानी काशी के मौजूदा राजाओं को ही बुलाते हुए जनता से रूबरू करवाने की कोशिश भी किए होंगे. जिसमें पेड मीडिया ने अपनी भूमिका बहुत खूब निभाई लेकिन वास्तविकता से आपको जोड़े रखना हमारा कर्तव्य था इसी क्रम में मैंने यह आर्टिकल्स आप तक पहुंचाने की कोशिश की है. 

 

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