डॉ अम्बेडकर मानवतावादी समतापरक विचारों के पोषक थे

डॉ अम्बेडकर मानवतावादी समतापरक विचारों के पोषक थे

डॉ कामिनी वर्मा

समाज से अन्याय और असमानता समाप्त करने के लिए सतत संघर्षरत डॉ भीम राव अम्बेडकर का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है । स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के अभाव मे आदर्शसमाज स्थापित नही हो सकता।पितृ सत्ता प्रधान भारतीय समाज मे नारी की स्थिति या तो देवी की रही है या दानवी की ।

संवैधानिक रूप से मानवीय गरिमा प्रदान करने का पुनीत कार्य डॉ भीमराव अम्बेडकर ने किया।उन्होंने लिंग के आधार पर भेद उत्पन्न करने वाली विधियों और मान्यताओं को संवैधानिक रूप से समाप्त करके उनको समाज में बराबरी  का स्थान दिलाया। सरकारी सेवाओं में स्त्रियों को स्थान देने के साथ धार्मिक विषयों में भी स्वतंत्रता प्रदान की। हिन्दू कोड बिल का निर्माण करके उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किये।


तत्कालीन समाज मे रूढ़ियाँ ,  परंपराएं , रीति रिवाज प्रभावी थे। बहु पत्निवाद का भी प्रचलन था। छोटी छोटी बातों पर पत्नी का त्याग करना आम बात थी। परिवार में स्त्रियों का अपना कोई अस्तित्व नही होता था वह आजीवन पिता, पति ,पुत्र पर ही आश्रित थी। महिलाओं की स्थिति मात्र सेविका जैसी ही होती थी।परिवार की धुरी होने के बावजूद भी निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नही होता था।
मृत पति की संपत्ति की अधिकारी उसकी विधवा न होकर पुरुष के  सगे संबंधी ही होते थे।

विधवा द्वारा पुनः विवाह कर लेने पर उसकी संतान अवैध मानी जाती थी। निसंतान स्त्री किसी को गोद नही ले सकती थी। अंतर्जातीय विवाह उनके लिए वर्जित था। स्त्रियों की खरीद फरोख्त होती थी । सती और जौहर प्रथा को इतना महिमामंडित कर दिया था कि नारियां आगे बढ़कर स्वयं को अग्नि के सुपुर्द करने लगी थी। कभी कभी उन्हें बलात चिता में झोंक दिया जाता था और ऊपर से लकड़ी के गट्ठर डाल दिये जाते थे। चिता के चारों ओर तेज ध्वनि में ढोल नगाड़े बजते रहते थे

जिससे कि उसकी चीत्कार कोई सुन न सके और वह चिता से उठकर भाग न सके। इसका सजीव वर्णन भारत की यात्रा करने वाले विदेशी यात्री इब्नबतूता ने किया है। नारियों का लैंगिक शोषण करने के लिए मंदिरों में देवदासी प्रथा प्रचलित थी जिसके द्वारा समाज के ठेकेदार और मंदिरों के मठाधीश अपनी हवस की पूर्ति करते रहते थे।

इन सभी कुप्रथाओ और कुपरम्पराओ को रोकने के लिए समय समय पर प्रयास भी किये गए। अल्लाउद्दीन खिलजी , अकबर , औरंगजेब तथा औपनिवेशिक काल मे राजा राम मोहन राय, विलियम वेंटिक, ईश्वर चन्द विद्यासागर, हेस्टिंगस के प्रयासों से कानून बनाकर इसे बाधित करने की चेष्टा की गई थी। परंतु संवैधानिक रूप से इन प्रयासों को अमली जामा पहनाने का कार्य डॉ अम्बेडकर ने किया।


डॉ अम्बेडकर मानवतावादी महापुरुष थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज की विषमताओं को दूर करने में लगा दिया था। हिन्दू कोड बिल के द्वारा समाज मे सदियों से जारी रूढ़ियों और विधि विधानों को समाप्त करके समता पर आधारित विधियों को लागू किया। इस बिल में हिन्दू स्त्रियों को विवाह , तलाक आदि विषयों में पुरूषों के समान अधिकार दिया गया ।

अंतर्जातीय विवाह को वैद्यता प्रदान की गई। एक समय में एक ही पत्नी रखने का विधान किया गया। पति की मृत्यु के पश्चात उसकी सम्पति में संतान के बराबर हिस्सा तथा पिता की मृत्यु के उपरांत पुत्री को पुत्र के समान सम्पति का अधिकारी बनाया गया तथा गोद लेने का अधिकार दिया गया।पत्नी का परित्याग करने की अवस्था मे पति द्वारा गुजारा भत्ता देना अनिवार्य कर दिया गया । पुरुषों के एक से अधिक विवाह को प्रतिबंधित किया गया । इस प्रकार हिन्दू कोड बिल के द्वारा समाज मे शोषित पीड़ित स्त्रियों के हित मे शोषकों को दण्ड देने तथा स्त्रियों को सशक्त करने में हिन्दू कोड बिल मील का पत्थर साबित हुआ ।
संविधान में स्त्रियों को गरिमामयी स्थान देने के साथ ही उन्होंने उनकी सदियों से रुढ़ियों से ग्रसित मानसिक स्थिति को भी परिवर्तित करने का प्रयास किया


इसके लिए उनकी शिक्षा पर विशेष बल दिया । उनका मानना था कि स्त्री शिक्षा के बिना समाज का विकास नही हो सकता। सुशिक्षित और सभ्य परिवार के लिए पुरुषों और स्त्रियों का शिक्षित होना आवश्यक है । स्त्री शिक्षित होकर ही अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होगी और उनका उपभोग कर सकेगी । शिक्षित माता द्वारा दिये गए संस्कारों से ही बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होता है।  डॉ अम्बेडकर कहते थे कि एक पुरूष पढ़ता है तो सिर्फ वही पढ़ता है,और यदि स्त्री पढ़ती है तो पूरे परिवार का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने परिवार को सीमित रखने का संदेश दिया क्योंकि संतान कम होने पर वह अपनी ऊर्जा समाज के विकास में लगा सकेगी।


दलित स्त्रियों की शिक्षा के लिए 1924 में विद्यालय खोला। 1924 में ही जाई बाई चौधरी ने  चोखा मेला कन्या विद्यालय खोला। नारी सशक्तिकरण हेतु चलाये गए आंदोलन में लाखों शिक्षित , अशिक्षित ,घरेलू , गरीब, मजदूर, किसान, दलित , शोषित स्त्रियां शामिल हुई थी। स्त्रियों को गरिमामयी जीवन जीने के लिए प्रेरित किया । पत्नियों को पति की दासता अस्वीकार करने के लिए कहा , उन्हें गृहलक्ष्मी की परिधि से निकलकर सार्वजनिक जीवन मे आने के लिए प्रोत्साहित किया ।


गले और हाथों में भारी आभूषणों को अस्पृश्यता की पहचान बताकर पहनने से मना किया। सार्वजनिक जीवन मे  कारखानों , खेत खलिहानों में पूरा वेतन न मिलने से इनके समय के घण्टे भी निश्चित थे । गर्भावस्था में उन्हें काम से भी हटा दिया जाता था। डॉ अम्बेडकर ने 1928 से मुम्बई विधान परिषद में श्रमिक स्त्रियों को प्रसूति अवकाश प्रदान करने के लिए प्रस्तुत बिल के पक्ष में अपने विचार रखे । नारियों की सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक और धार्मिक स्थिति मजबूत करने के लिए 1928 में महिला मंडल की स्थापना की ।

चावदार तालाब को सार्वजनिक रूप से खुलवाने तथा पूजा के लिए पार्वती मंदिर में प्रवेश करने के लिए डॉ अम्बेडकर ने दलित स्त्री तनीबाई की अगुवाई में सत्याग्रह किया । 1930 से 1934 के दौरान नासिक के कालाराम मंदिर में प्रवेश आंदोलन में सीताबाई , गीताबाई , रमाबाई गायकवाड़, ताराबाई आदि सैकडों नारियों ने भाग लिया और कारावास भी गयीं । 1936 में इन्होंने जोगिनों , वैश्याओं और देवदासिओं का सामूहिक विवाह करवाया और उन्हें समाज मे सम्मानपूर्ण स्थान भी दिलाया।


इस प्रकार नारियों को मानवीय आधार पर प्रतिष्ठित करने के लिए  उन्होंने निरन्तर प्रयास किया । उनके द्वारा किये गए नारी सशक्तिकरण आंदोलन में हज़ारों स्त्रियां शामिल हुई  और स्वयं नेतृत्व भी किया। डॉ अम्बेडकर मानवतावादी , समतापरक विचारों के पोषक थे ।

वह नारियों को मानवीय आधार पर गरिमा प्रदान करने के लिए उनको मानसिक , सामाजिक, धार्मिक , आर्थिक तथा राजनीतिक रुप से स्वतंत्रता प्रदान करना चाहते थे। स्त्रियों के जीवन मे क्रांतिकारी परिवर्तन करने की दिशा में उन्होंने हिन्दू कोड बिल बनाकर उन्हें पुरुषों के समान विधिक अधिकार प्रदान  किये।

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