खंडित जनादेश की तरफ बढ़ता हिंदुस्तान! क्या देश की जनता देगी खंडित जनादेश? 

खंडित जनादेश की तरफ बढ़ता हिंदुस्तान! क्या देश की जनता देगी खंडित जनादेश? 

कारण के तौर पर देश में आर्थिक मंदी वजह बता रहे हैं अर्थशास्त्री

घरेलू चुनौतियों को छोड़ मौजूदा दौर में सरकार वैश्विक चुनौतियों का ढिंढोरा पीट रही है. आखिर क्यों बार-बार वैश्विक चुनौतियों को देश में परोसा जा रहा है. देश के भीतर मौलिक और मूलभूत जिम्मेदारियों से देश की सरकार लड़ने के बजाय अंतरराष्ट्रीय पहुंच पकड़ और सेना के कंधों पर सहारा ले रही और अपने प्रचार तंत्र का भरपूर फोकस इन्हीं के इर्द-गिर्द घुमाने की कोशिश भी शायद हो रही है. बिना सलाह लिए पीएम के द्वारा किया गया फैसला कहीं मूल कारण तो नहीं? तमाम तरीके के सवाल जेहन में उठ खड़े हुए हैं.

कृषि संबंधी दुश्वारियां और नोटबंदी जीएसटी जैसे फरमानो के बावजूद सरकार आखिर देश की जनता का ध्यान राष्ट्र सेना पुलवामा जैसे मुद्दों को आगे रखकर कहीं भटकाने का कार्य तो नहीं कर रही और शायद यही वह वजह होगी जिसके चलते देश की जनता खंडित जनादेश भी दे सकती है .

 

इस बार के संसदीय चुनाव में तकरीबन 136 करोड़ आबादी में से लगभग 100 करोड़ जनता अपने मतों का पॉवर दिखाएगी ऐसी संभावना विश्लेषकों ने जाहिर की है. पिछले 5 वर्षों का कार्यकाल पूर्ण बहुमत से आई सरकार ने पूरे कर तो लिए लेकिन जनता के हाथ क्या लगा यह तो शायद जनता को भी नहीं पता. आने वाला जनादेश किस पार्टी को मिलेगा इसकी भी संभावना तलाशने में मीडिया और एजेंसियां तत्परता दिखा रही लेकिन 23 मई के बाद वह भी सारी अटकलें खत्म हो जाएंगी, देश को मिलेगी जनता द्वारा चुनी गई नई सरकार.

 

राष्ट्रवाद राम मंदिर का मुद्दा लिए बीजेपी ताल ठोक रही तो वहीं विपक्षी पार्टियां बेरोजगार युवा शिक्षा न्याय और राफेल रक्षा सौदे जैसी बातों को लेकर चुनावी मझधार में कूद पड़ी है. राफेल नोटबंदी जीएसटी रोजगार किसानों के मुद्दे को लेकर असलियत ना बताने के आरोप झेल रही सत्ताधारी पार्टी भी विपक्षियों पर राष्ट्रद्रोह जैसे आरोप लगा रही है. खैर रिपोर्ट कार्ड जल्द देश की जनता के हाथों में आने वाली है एक तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की कमर टूटने की बात हो रही तो वही सरकार 100% बिजली घरों तक पहुंचाने की चर्चा सोशल मीडिया पर कर रही. डिजिटल इंडिया के नाम और 100 स्मार्ट सिटी सांसदों के आदर्श गांव पर अब सरकार कोई बात करने के मूड में नहीं दिख रही. तभी तो मेनिफेस्टो का रूप रेखा राष्ट्रद्रोह सेना पुलवामा पर सिमट गया है.

 

वैश्विक स्तर पर अगर देश इतना मजबूत हो गया है तो अर्थव्यवस्था और बैंक अपने को कमजोर क्यों महसूस करने लगे. देश में विपक्ष का हल्ला बोल है आर्थिक मंदी नोटबंदी जीएसटी को लेकर लेकिन पक्ष इन मुद्दों को लेकर चुनाव नहीं लड़ना चाहती है .देश के पढ़े-लिखे युवा रोजगार की बात पर आते हैं तो उन्हें भावनात्मक तौर पर उलझा कर राष्ट्रभक्ति और सत्ता द्वारा बनाए गए पाठ्यक्रम दोबारा से पढ़ाया जाने लगता है.

 

बैंकों से अलग हटने की वजह या जवाबदेही स्थापित ना करने की शायद वजह रही रिजर्व बैंक के गवर्नर का इस्तीफा देना. रोजगार के नाम पर सर्विस सेक्टर से लेकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर तक सभी तहस-नहस होते दिख रहे हैं रोजगार सृजन भी नहीं हो पा रहा है कृषि पर निर्भरता बढी लेकिन कृषि तकनीकी जवाबदेही भी सरकार नहीं चाहती लेना. इसी वजह से किसान भी सड़कों पर दिखे जिनकी दिल्ली रवानगी तक की खबरें सुर्खियां बटोर रही थी.हालांकि अपने कार्यकाल में वह आर्थिक सुधार के जो संकेत दिखा रहे थे उस पर अर्थशास्त्रियों ने अपनी असहमति भी जाहिर की. इन्वेस्टमेंट भी देखा जाए तो बाहरी कंपनियों की नहीं के बराबर दिखी. जिस वजह से भी अर्थव्यवस्था पटरी पर लाने के उपाय भी धराशाई ही हुए. शायद तभी तो इस सरकार के कार्यकाल को संक्रमण काल के तौर पर अर्थशास्त्री देख रहे हैं. वैसे आने वाले 5 वर्ष देश का भविष्य जनता ही तय करेगी देखना यह होगा जनता किसे सत्ता की कुर्सी देकर स्थापित करती है. 

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