नौसिखिये व फर्जी पत्रकारों की वजह से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की हो रही है तौहीन

नौसिखिये व फर्जी पत्रकारों की वजह से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की हो रही है तौहीन

रिपोर्ट-डीके सिंह

बाराबंकी
क्षेत्र में पनप रहे फर्जी व नौसिखिये पत्रकारों से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की तौहीन हो रही है। क्योकि कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे इन फर्जी पत्रकारों के झुंड में वास्तविक कलमकार अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। जबकि इन फर्जी कथित पत्रकारों ने पत्रकारिता के मूल अस्तित्व को गिरवी रख कर उसे कमाई का जरिया बना लिया है।

जिसके परिणामस्वरूप मीडिया अपने मूल अस्तित्व के लिए संघर्ष करती नजर आ रही है।
लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहे जाने वाला मीडिया लगातार लोगो के बीच अपनी विश्वनीयता लगातार खोता हुआ नजर आ रहा है।

वर्तमान समयांतराल में खबरों की विश्वनीयता और फर्जी न्यूज़ पोर्टलों की भीड़ ने मीडिया के अस्तिव को बहुत ही गहरे संकट में डाल दिया है। क्योकि फर्जी पत्रकारों की बढ़ती भीड़ ने पत्रकारिता जगत को धब्बा लगाना शुरू कर दिया।

बात करे ग्रामीणक्षेत्रों की तो यहाँ फर्जी कथित पत्रकारों व फर्जी समाजसेवी संगठनों की बाढ़ सी आई हुई है। थाना परिसर सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र टिकैतनगर मथुरानगर बनीकोडर बदोसराय और ब्लाक मुख्यालय तथा तहसील परिसरों में दर्जनों की संख्या में कथित फर्जी पत्रकार घूमते हुए मिल जाएंगे जो अपने आपको पत्रकार बता कर धन उगाही करके पत्रकारिता जगत को बदनाम कर रहे हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि इन तरह के लोगों का पत्रकारिता से कोई मतलब नहीं है और न ही खबरें लिखने का सलीका ही पता है और तो और
इन कथित पत्रकारों में तमाम लोग ऐसे भी मिलेंगे जो ठीक से हिन्दी भी नहीं लिख पाते और न ही जनता को यह पता चल पाता है कि उनका अखबार कहाँ बंटता है और चैनल किस टी वी पर चलता दिखाई देता है।

लेकिन अपने आपको पत्रकार बता कर धौस जमाते रहते हैं ताकि कुछ खर्चा पानी मिल जाए। देश में हजारों अखबार और सैकड़ों संचार चैनल अपने तरीके से इस समय जनतंत्र के बीच हैं। संविधान की धारा 11 (1) सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देती है।

देश की मीडिया भी इसी अधिकार से लैस है। दरअसल देश में आज जो मीडिया का स्वरुप है वह कुछ साल पहले तक काफी अलग था। पत्रकारिता पेशा नहीं बल्कि एक मिशन थी। मीडिया का काम जनमानस में जिम्मेदारीपूर्ण दायित्वों का बोध कराना था।

यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तमाम अखबारों ने अद्वितीय भूमिका अदा की। स्वयं गाँधी जी, मदन मोहन मालवीय, पराडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे लोग भी पत्रकारिता को अपने हथियार के तौर पर अपनाए हुए थे।

तब बिना पूंजी वाले पत्रकारों को सिर्फ समाज की चिंता थी।जबकि आज कुछ पत्रकार दलाली, लाबिंग और तमाम दूसरे प्रवृतियों में संलग्न हैं । तो वही दूसरी ओर विभिन्न प्रकार के सामाजिक संगठन बना कर कतिपय लोग बहती गंगा में हाथ धोने को उतावले हो रहे हैं।

और थानो व ब्लाक तथा तहसील मुख्यालय को अपना निशाना बना कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मीडिया के चरित्र को गिराने में खबरिया चैनलों की भूमिका अधिक है। खबरिया चैनलों का इतिहास बहुत पुराना नहीं है।

उल्लेखनीय है कि देश में हुए संचार क्रांति के बाद न्यूज चैनलों का अस्तित्व आया। चौबीस घंटे चलने की मज़बूरी वाले कई चैनल टीआरपी के फेर में चौथे स्तंभ के मूल भावना को तार तार कर रहे हैं। अन्धविश्वास और अश्लीलता से चलने वाले कई खबरिया चैनल दिन-ब-दिन समाज में मीडिया की विश्वसनीयता को घटा रहे हैं। साथ ही मीडिया हाउस में कारपोरेट जगत की हिस्सेदारी ने इसका चेहरा और बदरंग कर दिया है।

मिशन के रूप में चलने वाले कई अखबार और चैनल अब कारपोरेट का हिस्सा हैं और उनके मालिकान बाज़ार के बेताज बादशाह मीडिया और कारपोरेट के इस गठजोड़ ने ही ऊपर उठे सवालों को जन्म दिया है। इस गठजोड़ ने मीडिया में पेड न्यूज के एक नए स्वरूप को अंजाम दिया है।

इसी रिश्ते कि वजह से आने वाले दिनों में चौबीस घंटे के चैनल और अखबार पर पेड न्यूज बर्चस्व हो गया। सैकड़ो चेहरों पर मुस्कान लाने वाले कई समाजसेवी खबरों में हाशिए पर हैं जबकि असभ्यता की हदें पार करने वाले सुर्खियों में है। आज मीडिया में भुखमरी से बचने के लिये कोख बेचने वाली माताओं की चर्चा तक नहीं।हमारी मीडिया को नक्सलियों की याद तब आती है जब वे हमारे सुरक्षा बल पे हमले करते हैं। तमाम दुर्घटनाओं के शिकार लोग तभी खबरी विषय बनते हैं जब वैसी ही कोई बड़ी घटना दोबारा होती है।

आत्मदाह की खबर को लाइव दिखाना या किसी बाबा की फर्जी समाधि को सीधे प्रसारित करने की होड़ ने भी मीडिया में व्याप्त संवेदनहीनता को उजागर किया है।एक जमाना था जब अखबार की सुर्खियाँ महीनों चर्चा का विषय होती थीं और अब अखबार बेचने के लिये स्कीम देनी पड़ती है।

इसमें कोई संदेह नहीं की आजादी के बाद कई मौकों पर मीडिया ने अपनी भूमिका को बखूबी निभाया है। आपातकाल, जे पी आंदोलन और हाल ही में हुए अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन में मीडिया की भूमिका असंदिग्ध रही है। आजादी के बाद हुए देश में कई घोटालों को उजागर करने में भी मीडिया ने अपना योगदान दिया है। लेकिन यह भी कड़वा सच है मीडिया और कारपोरेट गठजोड़ का ही फलस्वरूप लोकतंत्र का चौथा खम्भा अपनी साख गवां रहा है।

यह कहना उचित होगा कि कारपोरेट जगत की पत्रकारिता में बढ़ी हिस्सेदारी ने इसे बाजारवाद की चपेट में ला दिया। जो भी बाज़ार में खड़ा है उसे मुनाफे की चिंता करनी ही पड़ेगी।स्थिति इतनी बदतर हो गई है कि गली गली घूम रहे कथित पत्रकार जनता की समस्याओं को सुलझाने का नही बल्कि उलझा कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।


दुःखद तथ्य यह है कि टिकैतनगर सिरौली गौस पुर दरियाबाद पूरेडलई रामसनेही घाट क्षेत्रों में कथित फर्जी नौसिखिये पत्रकारों ने आतंक मचा रखा जिससे पत्रकारिता जगत बदनाम हो रहा है। और पत्रकारिता को कमाई का जरिया बना लिया है जिसके कारण पत्रकारिता अपने मूल उद्देश्यों से भटकती जा रही है

और अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है और यदि इसका शीघ्र निराकरण नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब लोग मीडिया पर यकीन करना छोड़ देंगे।

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