रोटी की खोज में जरायम की तरफ भटकता बचपन

रोटी की खोज में जरायम की तरफ भटकता बचपन

फतेहपुर खबर

  • रोटी की खोज में जरायम की तरफ भटकता बचपन
  • दोषपूर्ण शिक्षा व्यवस्था

आज भारत/प्रदेश सरकार की तमाम योजनाएं बाल कल्याण के लिए चलाईं जा रही हैं सरकारों को इन कल्याणकारी योजनाओं का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए कि क्या वास्तव में इन करोड़ो रूपये के ख़र्च के बाद जमीनी स्तर पर इनका कुछ फायदा है कि नहीं

क्योंकि इतना सबकुछ होने के बाद भी सड़कों के किनारे,रेलवे स्टेशन और बस स्टैंडों पर खाली बोतल, लोहा, प्लास्टिक बीनने वाले बच्चे बड़ी मात्रा में देखे जा सकते हैं अभी मैन करीब 9 या दस साल के एक बच्चे को देखा वह प्राइमरी स्कूल की ड्रेस पहने वह ठेले पर पानी पूरी (पानी के बतासे) बेच रहा था कारण उसके पिता ने भी ऐसे ही एकदिन अपने जिंदगी का सफर शुरू किया था और धीरे धीरे कर गलत संगत में पड़कर नशे का आदि हो गया जवानी तक आते आते टी0बी0 का मरीज हो गया

अब उसका जीवन अंतिम पड़ाव पर है तो सवाल ये पैदा होता है कि केवल धन की बर्बादी ही अच्छे का पैमाना नहीं है अब वो बच्चा क्या पढ़ेगा बस दोपहर तक स्कूल में इसलिए बैठा की खाना मिल जाएगा और पहनने को वर्दी मिल जाएगी तो क्या यही है हमारी बाल कल्याणकारी योजनाएं हैं नहीं साहब, हमारी ये योजनाएं करोड़ों का बजट डकार कर मात्र सफेद हांथी साबित हो रहीं है समाज के उस बर्ग को इसका कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है

जो मिलना चाहिए कहीं न कहीं तो इन योजनाओं में कुछ न कुछ कमियां हैं नहीं तो भारी भरकम तनख्वाह वाले सरकारी स्कूल में उंगली पर गिनाने के लिए भी बच्चे नहीं होते जबकि मामूली पगार वाले प्राइवेट स्कूल में क्लास में बच्चे ठूंसे रहते हैं और उन्ही में टोपर भी निकलते हैं तो क्या जरूरी नहीं है कि गरीबों के कल्याणकारी योजनाओं का पुनर्मूल्यांकन किया जाए और उन्हें बालहित्कारी बनाया जाए तभी हमारे बच्चे मुख्य धारा से जुड़ पाएंगे

तभी उनका विकाश संभव है और तभी वे भटकेंगे नही और कूड़े के ढेर,रेलवे लाइन इत्यादि जगहों पर  ये नहीं मिलेंगे हमारे समाज में जरायम भी कम होगा क्योंकि भूखा पेट ही जरायम को जन्म देता है गरीबी अपराध की जननी है इसलिए आज नहीं तो कल हमें अपनी व्यवस्थाएं तो बदलनी ही होगी तभी समाज में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिलेगा।

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