गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण

गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण

गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण

                                                                                     

                                                    डॉ॰ दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

अनेक लेकिन किन्तु परंतु के बीच गरीब सवर्णों को शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण का कानून अन्ततोगत्वा सदन के दोनों सदनों में पारित हो गया| वह भी भारी बहुमत से| यह संविधान का 124वां संशोधन विधेयक है|

इस विधेयक के प्रविधानों के अनुसार अब देश के बहुत बड़े सवर्ण तबके को इसका लाभ प्राप्त होगा| इससे न केवल हिन्दू बल्कि मुस्लिम तथा ईसाई धर्म का उच्च वर्ग भी लाभान्वित होगा| सदन के दोनों सदनों मे इस विधेयक पर हुई बहस के दौरान विपक्षी सांसदों ने इस पर सवाल तो बहुत उठाए परन्तु इसके विरोध में मतदान करने वालों का प्रतिशत न के बराबर ही रहा| कांग्रेस समेत कोई भी बड़ा विपक्षी दल इस विधेयक के विरोध में मतदान करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया|

लोकसभा मे इसके विरोध में मात्र तीन तथा पक्ष में 323 मत पड़े थे| जबकि राज्यसभा में इस विधेयक के पक्ष में 165 तथा विरोध में मात्र सात मत पड़े| अब राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह विधेयक अमल मे आ जाएगा| लेकिन इस विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलने के पूरे आसार हैं| अनेक संविधान विशेषज्ञ यह मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में इस विधेयक के ठहर पाने की सम्भावना  बहुत कम है|

इस विधेयक को मात्र तीन दिन में जिस तरह से अमली जामा पहनाने की कोशिश की गयी उससे देश की जनता का आश्चर्य चकित होना स्वाभाविक है| इसे 2019 के आम चुनाव के दृष्टिगत भाजपा का चुनावी पैतरा बतलाया जा रहा है| संसद के मानसून सत्र के अन्तिम दिनों में आनन-फानन में लाये गए इस विधेयक पर विपक्षी दलों को होमवर्क करने का कोई भी अवसर नहीं मिला|

अतः सभी ने इसका समर्थन करना ही बेहतर समझा और विधेयक भारी बहुमत से पारित हो गया| क्योंकि चुनाव के समय कोई भी दल सवर्ण मतदाताओं को नाराज नहीं करना चाहता था| कुल मिलाकर सत्ता पक्ष और विपक्ष द्वारा सारा का सारा गणित चुनावी नफा नुकसान को देखकर ही लगाया गया| 

अब चर्चा का विषय यह है कि इस विधेयक के अमल मे आने के पश्चात आखिर सवर्ण गरीबों को कितना और कैसे लाभ होगा? इसके लिए सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा अप्रैल 2017 मे दिये गए उस निर्णय पर ध्यान केन्द्रित करना होगा जिसमें कहा गया है कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को आरक्षित वर्ग में ही नौकरी मिलेगी, चाहे उसने सामान्य वर्ग से ज्यादा अंक क्यों न हासिल किए हों| नये विधेयक के अनुसार 10 प्रतिशत का आरक्षण उन सवर्ण परिवारों को मिलेगा जिनकी वार्षिक आय आठ लाख रुपये से कम है|

जिनके पास एक हजार वर्गफुट या इससे कम क्षेत्रफल वाला मकान है वे भी इसके पात्र हैं| ग्रामीण क्षेत्रों में जिनके पास पाँच एकड़ या इससे कम कृषि योग्य भूमि है वे भी इस आरक्षण व्यवस्था के दायरे में आते हैं| अब यदि हम राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण संगठन द्वारा जारी किए गए आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो देश में 8 लाख से कम की वार्षिक आय वाले 95 प्रतिशत परिवार हैं| एक हजार वर्ग फुट या इससे कम के क्षेत्रफल वाले मकान में निवास करने वाले परिवार 90 प्रतिशत हैं|

इसी तरह यदि हम ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो देश के लगभग 87 प्रतिशत किसान ऐसे हैं जिनके पास 5 एकड़ या इससे कम कृषि योग्य भूमि है| इस तरह से पिछड़ों और दलितों को मिलाकर देश की लगभग 90 प्रतिशत आबादी आर्थिक आधार पर आरक्षण की श्रेणी में आती है| जिसमें से 22.50 प्रतिशत दलितों को तथा 27 प्रतिशत पिछड़ा वर्ग को अर्थात लगभग 50 प्रतिशत का आरक्षण पहले से ही सरकार ने दे रखा है| बचे हुए 40 प्रतिशत गरीब सवर्णों को नये विधेयक में मात्र 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है| जबकि अप्रैल 2017 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी आरक्षण व्यवस्था के अनुसार यह 40 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग के लिए निर्धारित 50 प्रतिशत सीटों के लिए स्पर्धा करती थी|

अब वह मात्र 10 प्रतिशत सीटों के लिए ही स्पर्धा कर पाएगी तथा शेष बची 40 प्रतिशत सीटें देश के बाँकी बचे 10 प्रतिशत अनारक्षित वर्ग अर्थात अमीरों के लिए स्वतः सुरक्षित हो जाएंगी| कांग्रेस के आनंद शर्मा द्वारा दिया गया 98 प्रतिशत का आंकड़ा तो और भी भयावह तश्वीर पेश करता है| आनंद शर्मा के अनुसार आठ लाख रुपये तक की आय और पाँच एकड़ जमीन के मानक में देश की करीब 98 फीसदी आबादी आती है| इसका अर्थ यह होगा कि इतनी आबादी को मात्र 10 फीसदी कोटे में ही संघर्ष करना पड़ेगा|

ऐसे में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के लिए तो यह आरक्षण व्यवस्था विष देने के बराबर साबित होगी| क्योंकि ढाई लाख से आठ लाख रुपये वार्षिक आय वाले परिवार अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने में प्रायः सक्षम होते हैं| ऐसे परिवार अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षा के लिए अच्छे से तैयार कर सकते हैं| परन्तु ढाई लाख से कम की वार्षिक आमदनी करने वाले गरीब सवर्णों के लिए यह असंभव जैसा है| वहीं मजदूरी करके पाँच-दस हजार रुपया महीना कमाने वाले परिवार के बच्चों के लिए तो सरकरी नौकरी कर पाना स्वप्न जैसा हो जाएगा|

जबकि सभी राजनीतिक दल इसी गरीब तबके को ऊपर उठाने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं| इस तरह एक बार फिर भाजपा पर यह आरोप लग सकता है कि इस पार्टी का प्रत्येक कदम सिर्फ और सिर्फ देश के पूंजीपतियों को लाभ प्रदान करने के लिए उठता है| इस विधेययक पर हुई चर्चा के दौरान आयकर की सीमा और सरकार द्वारा दी गयी गरीबी की नयी परिभाषा को लेकर भी सवाल उठाए गए|

आयकर के पहले स्लैब में 2.5 लाख से 5 लाख रूपए की वार्षिक आय करने वालों को 5 प्रतिशत तथा 5 लाख से 10 लाख रुपये की वार्षिक आय वालों को 20 प्रतिशत आयकर देना होता है| इस तरह से एक ओर जो व्यक्ति कर प्रदाता है, दूसरी ओर वही व्यक्ति गरीब भी है|

ऐसे अनेक सवाल जब सुप्रीम कोर्ट में उठेंगे तो यह विधेयक कितनी देर ठहर पाएगा| इसे बड़ी सरलता से समझा जा सकता है| 

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                              डॉ॰दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

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