गृहस्त संत कौन.....

गृहस्त संत कौन.....

( रिपोर्टर आनन्द त्रिपाठी अयोध्या )

त्यागी सोभा जगत में, करता है सब कोय।* हरिया गिरसत साध का, भेदी विरला होय।*

त्यागी सन्त को तो सब जानते हैं, पर ग्रहस्थ सन्त को कोई जानता ही नहीं ! गृहस्थ सन्त गुप्त सन्त होता है। वह सब कुछ होते हुए भी अपना कुछ नहीं मानता।

सब के काम की बात बताता हूँ। आपकी जो परिस्थिति हो, उसमें सन्तोष करो। ग्रहस्थ में रुपया रखो, ग्रहस्थ के सब काम करो, पर आ जाए तो आनन्द, चला जाय तो आनन्द ! रुपया कम हो जाय तो आनन्द, ज्यादा हो जाय तो आनन्द ! हरेक स्थिति में आनन्द रखो।

न रुपया रखने का आग्रह हो, न रुपया नहीं रखने का आग्रह हो। जो परिस्थिति आये, उसी में मस्त रहो। भगवान का भरोसा रखो और पास में करोड़ों रुपये रहें तो कोई बात नहीं, कौड़ी भी न रहे तो कोई बात नहीं, ऐसी वृति कर लो।

चिंता मत करो। रुपयों के परवश मत होओ। भीतर में आश्रय भगवान का ही रखो, पर भगवान निर्वाह करेंगे--यह आशा भी भगवान से मत रखो। भगवान दें न दें, उनकी मरजी-- 'जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये, सीताराम सीताराम सीताराम कहिये'। जय महाकाल।।

 

( पंडित अम्बरीष चन्द्र मिश्रा )

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