अनुमानित करोड़ों रुपये की लागत महीने भर में इन योजनाओं पर खर्च हो रही है

अनुमानित करोड़ों रुपये की लागत महीने भर में इन योजनाओं पर खर्च हो रही है

हिमाचल जैसे प्रदेश में मध्याह्न भोजन योजना और मुफ़्त वर्दी वितरण से सरकारी विद्यालयों में कोई लाभ नहीं हुआ। 15 अगस्त 1995 से केन्द्रीय सरकार ने मध्याह्न भोजन योजना को शुरू कर दिया था जिसका मूल उद्देश्य गरीबी रेखा से नीचे के बच्चों को पाठशाला तक लाने व उनको साक्षर करना था। लेकिन नवउदारवाद के चलते शिक्षा में भी समय के अनुसार परिवर्तन निश्चित था जिसका परिणाम यह हुआ कि निजी विद्यालयों की और सबकी होड़ शुरू हो गई और सरकारी विद्यालय धीरे - धीरे शून्यता की ओर बढ़ते गए। बावजूद इसके हिमाचल सरकार ने एक और मुफ़्त वर्दी वितरण की पहल शुरू कर दी, जिसका परिणाम भी संतोषजनक नहीं रहा। आज स्थिति यह हो गयी है कि हज़ारों पाठशालाएँ बंद होने की कगार पर हैं और कुछ बंद भी कर दी गई हैं।

अनुमानित करोड़ों रुपये की लागत महीने भर में इन योजनाओं पर खर्च हो रही है, परन्तु कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। अगर यह राशि निजी विद्यालयों की तरह साफ़ सफ़ाई और विद्यालयों के प्रांगण को सुंदर तरीके से सजाने और विद्यालयों में अध्यापकों को भर्ती करने हेतु खर्च की जाए तो सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। आज भी जिन विद्यालयों में अध्यापकों के पद रिक्त हैं वहाँ पर बच्चों की संख्या कम और जहाँ पर सभी विषयों के अध्यापक हैं वहाँ पर बाहर से भी छात्र प्रवेश लेने के लिए आते रहते हैं। मध्याह्न भोजन योजना और मुफ़्त वर्दी योजनाओं के घोटाले सामने आते रहते हैं जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका लाभ ठेकेदार, अधिकारी और कर्मचारी उठाते रहते हैं। हिमाचल सरकार को इस दिशा में भी उचित कदम उठाने चाहिए, जिससे देश की राशि सही तरीके से देश की तरक्की के लिए देश की जनता तक पहुंच सके। 

राजेश सारस्वत  

ठियोग जि. शिमला

 

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