भाजपा जातीय समीकरण और सांसदो के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर काटेगी दो दर्जन प्रत्याशियों का टिकट

भाजपा जातीय समीकरण और सांसदो के रिपोर्ट कार्ड के आधार पर काटेगी दो दर्जन प्रत्याशियों का टिकट

क्राइम संवाददाता- रणवीर सिंह 

लखनऊ:-

भारतीय जनता पार्टी को मिशन 2019 फतेह करने से पहले काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इस बार   सबसे बड़ी चुनौती टिकट बंटवारा है। सूत्रों के अनुसार, बीजेपी ने दो दर्जन से अधिक सांसदों का टिकट काटने की तैयारी कर ली है।

इसकी एक्सरसाइज प्राथमिक तौर पर शनिवार को दिल्ली में हुई संसदीय दल की बैठक में हो चुकी है। बताया  जा रहा है कि बीजेपी जीतने वाले प्रत्याशिय़ों पर ही अपना दांव लगाएगी। जिसको  लेकर सांसदों की रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। उसमें जातीय समीकरण और प्रत्याशी के रिपोर्ट कार्ड पर खास फोकस किया गया है। बताया जा रहा है कि इन सीटों पर अधिकांश ऐसे सांसद हैं। जो कई बार अपनी ही पार्टी के सिद्धांतो को लेकर मुकर भी चुके हैं। वहीं बहराइच की बीजेपी सांसद ने अब तो कांग्रेस का दामन भी थाम लिया है।

दूसरी तरफ टिकट काटने का दूसरा कारण 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद जीत का आंकड़ा कम रहना भी है। संभल के सांसद सत्यपाल सिंह सैनी की जीत मात्र पांच हजार से कुछ अधिक वोटों से हुई थी। वहीं रामपुर के सांसद नैपाल सिंह की जीत 23000 से और बस्ती से हरीश द्विवेदी की 33000 से कुछ अधिक वोटों से जीत हुई थी। ऐसे ही और नेताओं को भी कैटेगराइज कर लिया गया है।

दूसरी तरफ प्रदेश के लोकसभा सीटों पर जातीय समीकरण क्षेत्र में उनकी पकड़ और किए गए काम काज को आधार माना जाएगा वैसे भी पार्टी के नेताओं का कहना है कि बीजेपी सक्रिय कार्यकर्ताओं की पार्टी है। ऐसे में कभी चुनाव लड़ने के लिए तो कभी लड़ाने के लिए कार्यकर्ता हमेशा तैयार रहते हैं। बीजेपी  के प्रवक्ता समीर सिंह का कहना है कि पार्टी  में बड़े नेताओं के संसदीय क्षेत्र में बदलाव नहीं करने का मन बना रही है।

वैसे भी बीजेपी सबसे अंत में अपने प्रत्याशियों के नाम सामने लाने में विश्वास रखती है। इस बार भी उसी तरह की तैयारी चल रही है। जबकि दूसरे दल अपने प्रत्याशियों की घोषणा करने लगे हैं। बीजेपी का कहना है कि प्रत्याशी चयन एक प्रक्रिया है। बीजेपी उसी प्रकिया के तहत अपनी तैयारी में लगी हुई  है। वहीं बीजेपी एक बार फिर मोदी है तो मुमकिन है के नारे के साथ मैदान में उतर रही है।

ऐसे में स्थानीय प्रतिनिधियों से जनता की शिकायतों को नजर अंदाज नहीं किया जाएगा, साथ ही यह संदेश देने की कोशिश की जाएगी कि जनता अगर अपने प्रतिनिधि से नाखुश है तो उन्हें बदल दिया जाएगा।

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