बाल मजदूरी : गरीबी व लाचारी छोटे—छोटे बच्चों से करवा रही मजदूरी की तस्वीरें देख आप रह जाएंगे दंग

हर्षित मिश्रा

गरीबी और बेबसी के आगे सरकार की योजना भी निष्फल
बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए गरीबी का खात्मा जरूरी
अखिर क्यों गरीबों को नहीं मिल रहा सरकारी योजनाओं का लाभ


गरीबी का खात्मा जरूरी है। सरकार के साथ ही आम जनता की भी सहभागिता की आवश्यकता है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति अगर ऐसे एक बच्चे की भी जिम्मेदारी लेने लगे तो सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा। अपने आसपास नजर दौड़ाएं, तो रेस्टोरेंट, ढाबों, दुकानों और अन्य जगहों पर बच्चे काम करते हुए मिल जाएंगे। चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम कराना या करने को मजबूर करना, अपराध है। इसके बावजूद लोग थोड़े से लाभ के लिए बालश्रम कराते हैं। 

कुछ इनके अभिभावकों की मजबूरी है कि इनसे बालश्रम कराया जा रहा है जबकि प्रशासन की लापरवाही इतनी ज्यादा है कि इस अपराध को रोकने के लिए न तो प्रयास किए जा रहे है। दूसरों की जूठनों के सहाने वे अपना जीवनयापन करते हैं। 

बच्चों के इन अधिकार के बावजूद दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर
राज्य को 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए अनिवार्य तथा मुफ्त शिक्षा देना कानूनी रूप से बाध्यकारी है।
बालश्रम को प्रतिबंधित तथा गैरकानूनी कहा गया है।
बच्चों के स्वास्थ्य और रक्षा के लिए व्यवस्था करने के लिए राज्य कानूनी रूप से बाध्य है।
बच्चों को गरियामय रूप से विकास करने के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना राज्य की नैतिक जिम्मेदारी है।


जब यही बच्चे दो वक्त की रोटी कमाना चाहते हैं तब इन्हें बाल मजदूर का हवाला देकर कई जगह काम ही नहीं दिया जाता। अखिर ये बच्चे क्या करें, कहा जाएं ताकि इनकी समस्या का समाधान हो सके। 

अभिभावक बाल श्रम कराने को मजबूर हो, ऐसी योजनाओं का लाभ उन तक नहीं पहुंचाया जा रहा है। बंद वातानुकूलित कमरों में योजनाओं को लेकर दिशा निर्देश देने की प्रक्रिया पहले भी की जाती थी और अब कुछ ज्यादा तेजी से की जा रही है। 

समस्या योजनाओं की कमी की नहीं है, वास्तव में इन योजनाओं को धरातल पर लागू ही नहीं किया जाता। सिर्फ कागजी खानापूर्ति कर दी जाती है। वरना क्या वजह हो सकती है कि बाल श्रम रोकने के लिए तमाम योजनाएं होने के बावजूद आज भी चारों ओर बाल श्रमिकों की भरमार है। 

सड़कों से लेकर दुकानों तक बालक मजदूरी करते नजर आ जाएंगे। सरकार के नियमों के अनुसार कोई भी 14 वर्ष से कम आयु का बच्चा, जो मजदूरी करता है, बाल श्रमिक की श्रेणी में आता है। वास्तव में यह एक सामाजिक समस्या से ज्यादा आर्थिक समस्या है। जिसके चलते बालकों को मजदूरी करनी पड़ रही है। 

प्रबुद्ध लोगों की माने तो भारत में गरीबी और निरक्षरता ही बाल श्रम का कारण है। हापुड़, गढ़, पिलखुवा या जिले में किसी भी स्थान पर बालकों को मजदूरी करते देखा जा सकता है। अभिभावकों के सामने आर्थिक समस्या होती है जिसके चलते मजबूरन वे बच्चों को मजदूरी करने भेज देते हैं।

 गरीबी, लाचारी और कई बार माता-पिता की प्रताड़ना के चलते बच्चे बाल मजदूरी के इस दलदल में धंसते चले जाते हैं। बाल मजदूरी के मामले में अपना देश सबसे आगे है। 

1991 की जनगणना के हिसाब से बाल मजदूरों का आंकड़ा 11.3 मिलियन था जो 2001 में बढ़कर 12.7 मिलियन पहुंच गया। शहर में चाय के होटलों, रेस्टोरेंट, भोजनालयों, दुकानों पर छोटू, राजू, मुन्नी आदि मिल ही जाएंगे। 

ऐसा नहीं कि सरकार चिंतित नहीं है। सरकार ने कई योजनाएं चला कर बाल मजदूरी पर रोक लगाने का प्रयास किया है। सरकार ने आठवीं तक की शिक्षा को अनिवार्य और नि:शुल्क कर दिया है। लेकिन गरीबी और बेबसी के आगे यह योजना भी निष्फल साबित होती दिख रही है। बच्चों के अभिभावक सिर्फ इस वजह से उन्हें स्कूल नहीं भेजते क्योंकि उनके स्कूल जाने से परिवार की आमदनी कम हो जाएगी।

मजबूरी में क्या करें और कहां जाएं गरीब बच्चे?

सरकार ने बाल मजदूरी के खिलाफ कानून तो बना दिए। इसे अपराध भी घोषित कर दिया। लेकिन क्या इन बच्चों की कभी गंभीरता से सुध ली। अपने देश में बाल मजदूरों की इतनी अधिक संख्या होने का मुख्य कारण सिर्फ और सिर्फ गरीबी है। 

यहां एक तरफ तो ऐसे बच्चों का समूह है जो बड़े-बड़े महंगे होटलों में 56 भोग का आनंद उठाता है और दूसरी तरफ ऐसे बच्चों का समूह है जो गरीब हैं, अनाथ है। जिन्हें पेटभर खाना भी नसीब नहीं होता। 

आम जनता चाहे तो कोई गरीब बच्चा भूखा नहीं सोएगा।

बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने के लिए गरीबी का खात्मा जरूरी है। सरकार के साथ ही आम जनता की भी सहभागिता की आवश्यकता है। आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति अगर ऐसे एक बच्चे की भी जिम्मेदारी लेने लगे तो सारा परिदृश्य ही बदल जाएगा। अगर मिलकर हमने कुछ प्रयास किए तो फिर कोई मासूम बच्चा भूखा नहीं सोएगा।

क्या है कानून:

बाल मजदूर की स्थिति में सुधार के लिए सरकार ने 1986 में चाइल्ड लेबर एक्ट बनाया। जिसके तहत बाल मजदूरी को एक अपराध माना गया। रोजगार पाने की न्यूनतम आयु 14 वर्ष तय की गयी। लेकिन इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिख रहा है।
 

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