भाकपा -माले का 50 वाँ स्थापना दिवस जिला सचिव के अध्यक्षता में धूमधाम से मनाया गया

भाकपा -माले का 50 वाँ स्थापना दिवस जिला सचिव के अध्यक्षता में धूमधाम से मनाया गया

जमुई:-

शहर स्थित एक निजी होटल में भाकपा-माले का 50वां स्थापना दिवस जिला सचिव शम्भू शरण सिंह की अध्यक्षता में मनाया गया।उन्होंने कहा कि 22 अप्रैल 2019 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी -लेनिनवादी  की स्थापना के पचास साल पूरे हो रहे हैं।पार्टी का यह पचासवां स्थापना दिवस हम 17वें लोकसभा चुनाव के बीच मना रहे हैं।उन्होंने कहा की निःसंदेह यह चुनाव भारत में संसदीय लोकतंत्र की स्थापना के बाद से सबसे महत्त्वपूर्ण और निर्णायक चुनाव है।

आज मोदी शासन का फासीवादी मॉडल भारतीय लोकतंत्र पर अपना शिकंजा कसने के लिए,अपना शासनकाल बढ़ाने के लिए मैदान में है।संसदीय लोकतंत्र और संवैधानिक गणतंत्र की बुनियादी मान्यताओं पर खतरा मंडरा रहा है।

उत्तर प्रदेश के एक भाजपा सांसद ने तो खुलेआम कहा है कि 2019 के चुनाव आखिरी चुनाव हो सकता हैं।यह भी हो सकता है कि 2024 में कोई चुनाव न हो। इसलिए 2019 का चुनाव भारत में फासीवाद के खतरे को परास्त करने के लिए मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करने का चुनाव है।आज से तीन दशक पहले,जब साम्प्रदायिक-फासीवादी ताकतों का उभार हो रहा था,तभी से भाकपा-माले इस फासीवादी खतरे का मुकाबला करती आयी है।

भाकपा-माले ने जन्म से ही क्रांतिकारी संघर्षों का गौरवपूर्ण रास्ता चुना

वहीं मौके पर उपस्थित आइसा के राज्य उपाध्यक्ष बाबु साहब ने कहा कि पिछले पचास सालों में भाकपा-माले का क्रांतिकारी संकल्प और भी दृढ़ हुआ है। संघर्षों और पहलकदमियों का दायरा पार्टी और जन-संगठनों के नेतृत्व में बढ़ा है।

आजादी व लोकतंत्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने वाले शहीदों के सपनों का भारत बनाने का संघर्ष तेज हुआ है। नक्सलबाड़ी के किसान संघर्षों की धधक से पैदा हुई भाकपा-माले ने जन्म से ही क्रांतिकारी संघर्षों का गौरवपूर्ण रास्ता चुना जिसने भारत के खेत-खलिहानों को अपने आगोश में ले लिया।राजसत्ता के भयावह दमन के सामने अडिग खड़ी भाकपा-माले ने सामाजिक उत्पीड़न की सारी जंजीरें तोड़ने के लिए लोगों की आंखों में मुक्ति का सपना जगाया।

इससे उत्पीड़ित ग्रामीण ग़रीबों, क्रांतिकारी नौजवानों और मजदूरों के ऐतिहासिक संघर्षों की धारा फूट पड़ी।अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन उपनिवेशवाद-साम्राज्यवाद विरोधी आंदोलनों में ऐसे ही उदाहरण मिलेंगे जब किसी पार्टी को अपनी स्थापना से ही ऐसे दमन का सामना करना पड़ा हो,जो अपने दो शुरुआती महासचिव,दर्जनों केंद्रीय नेतृत्व के साथी और हजारों कार्यकर्ताओं को खोने के बावजूद अगिनपाखी की तरह अपनी ही राख से भाकपा-माले की तरह जी उठा हो।

50 वर्षों से लगातार भाकपा माले कर रही है क्रांतिकारी यात्रा

पचास वर्षों की क्रांतिकारी यात्रा में भाकपा-माले ने कुछ बुनियादी सबक लिए हैं। जिन्होंने कठिन चुनौतियों के दौर में भी पार्टी को टिकाए रखा और आज के फासीवादी हमले का मुकाबला करने के लिए तैयार किया।देश के कई हिस्सों में हमारे दलित व अन्य उत्पीड़ित समुदायों से आने वाले साथियों को वोट देने के अधिकार तक के लिए दबंग सामाजिक ताकतों और राज्य के खिलाफ तीखा संघर्ष चलाना पड़ा।हमारे साथियों को झूठे मुक़दमों,अन्यायपूर्ण सजाओं, हिरासतों में हत्याओं और राज्य समर्थित सामंती ताकतों व अपराधी गिरोहों द्वारा जन-संहारों का सामना तब भी करना पड़ा,जब फासीवादी भाजपा सत्ता में नहीं थी।लोकतंत्र के लिए संघर्ष भाकपा-माले के केंद्रीय उसूलों में शामिल है जो हमें आज के फासीवाद विरोधी निर्णायक संघर्ष के मोर्चे पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।

स्थापना से ही भाकपा-माले गरीब,दलित,आदिवासी और पिछड़े की रही है पार्टी

भाकपा-माले अपनी स्थापना के समय से ही भारतीय समाज की सबसे उत्पीड़ित और पिछड़े तबकों की पार्टी रही है।पार्टी की स्थापना कृषि क्रांति की इस साफ समझदारी से हुई थी कि इसके केंद्र में भूमिहीन खेत-मजदूर और गरीब किसान होंगे।यही भारत में जनता की जनवादी क्रांति की धुरी बनेगा। दलितों और आदिवासियों के साथ पार्टी की सघन एकरूपता और सामाजिक उत्पीड़न से मुक्ति की उनकी चाह के साथ गहन जुड़ाव पार्टी का स्वरूप तय करने में महत्त्वपूर्ण रहा है और यही पार्टी को हर विपरीत परिस्थिति का डटकर मुकाबला करने की ताकत और हिम्मत देता है।यही हमें जाति, वर्ग और जेंडर के केंद्रीय सवालों और आपसी रिश्तों को समझने की शक्ति देता है।वहीं जाति के उन्मूलन और पितृसत्ता के ध्वंस का लक्ष्य भाकपा-माले के लाल झंडे पर प्रमुखता से दर्ज हैं।

पार्टी के जन्म के समय ही दो भाग में बंट गया था भाकपा-माले

1969 में भाकपा-माले के जन्म के समय भारत का कम्युनिस्ट आंदोलन कार्यक्रम व रणनीति के सवाल पर सीपीआई व सीपीआई(एम) के रूप में दो-फाड़ हो चुका था।भाकपा-माले ने इस बहस को और तेज कर दिया और अपने आपको कम्युनिस्ट आंदोलन की गौरवशाली विरासत का वारिस घोषित किया।साथ ही आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलावों की पृष्ठभूमि में पार्टी ने खुद को साहसी व क्रांतिकारी भावना के झंडाबरदार के रूप में स्थापित किया।संघर्षों के रोजमर्रा के स्वरूप और नारे दिन ब दिन उन्नत होते गए हैं और आज पार्टी बिहार और झारखंड की विधानसभाओं में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।हथियारबंद संघर्षों पर पूर्ण निर्भरता ने भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के एक हिस्से को अराजकतावादी व्यवहार व सूत्रीकरण की तरफ धकेल दिया।भाकपा-माले ने इस तरह के संकीर्णतावादी अलगाव से भी खुद को अलग रखा है।

जनता का हित ही है पार्टी का हित

गौरतलब हो कि कामरेड चारु मजूमदार के आखिरी लेख की दो पंक्तियों ने 1970 के दशक की शुरुआत में भाकपा-माले को लगे धक्के से उबरने और का.जौहर व का. विनोद मिश्र के प्रेरणादायी नेतृत्व में अपने आंदोलन को पुनर्जीवित तथा फिर से संगठित करने में मदद की है।का.चारु मजूमदार के आखिरी लेख का यह सूत्रीकरण"जनता का हित ही पार्टी का हित है",ये भाकपा माले के राजनीतिक विश्लेषन और व्यवहार का निर्देशक बन गया।इसने पार्टी को संसदीय बौनेपन के खिलाफ संघर्ष चलाने और सभी चुनौतियों के सामने जनता के हित को बुलंद करने की प्रेरणा दी थी।दिसम्बर का.विनोद मिश्र ने दिसंबर 1998 में अपनी मृत्यु के समय तक का. विनोद मिश्र ने सोवियत संघ के ध्वंस और संघ-गिरोह की साम्प्रदायिक-फासीवादी ताकतों का मुकाबला करते हुए पार्टी का विकास और विस्तार जारी रखा।कार्यक्रम में  जयराम तुरी,बासुदेव राय, कंचन रजक,मुन्ना टुडू,गुलटेन पुजहर, इत्यादि दर्जनों लोग उपस्थित थे।

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