जब तक हासिल ना हो वो खटकती रहती थी...........

जब तक हासिल ना हो वो खटकती रहती थी...........

बचपन में आँखो में सपने अटक जाया करते थे और जब तक हासिल ना हो वो खटकती रहती थी आज भी वो वैसे ही है बस बचपन थोड़ा बड़ा हो गया है , सबर कल भी नही होता था आज भी नही ..जब तक मिल जाए तब तक सकून नही है ..

सच कहूँ तो कुछ और ही चाहता हुँ मैं..
भटकना भी तो किसी मंज़िल से बेहतर ही होता है पर यक़ीन पूरा है तलाश पूरी होगी ।।

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