कानून और धारा एक किन्तु पालन के पैमाने जुदा जुदा।

कानून और धारा एक किन्तु पालन के पैमाने जुदा जुदा।

कानून और धारा एक किन्तु पालन के पैमाने जुदा जुदा।
धारा 304 बी, 498 ए 3/4 डी पी एक्ट

आशुतोष पाण्डेय विशेष संवाद्दाता


आज हम दो - तीन  घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने बैठे हैं कि पुलिस - सरकार और अदालत के ऊपर कानून पालन में चेहरा देखकर क्या प्रभाव पड़ता है। 

अभी कुछ वर्ष पहले की घटना है शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का शव दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में 17 जनवरी 2014 को मृत पाया गया।
ठीक इसी प्रकार 9 जनवरी 2019 को बलिया बांसडीह के मैरीटार गांव की एक झोपड़ी में सन्तोष राजभर की पत्नी सुमित्रा का शव पाया गया।

सुनंदा पुष्कर के शव में 15 चोट के निशान पाये गये थे किन्तु सुमित्रा के शरीर में पीठ के तरफ खून के जमाव को चोट कहा गया। (मृत्योपरान्त हार्ट कार्य नहीं करता है और गुरूत्वाकर्षण बल के कारण शरीर का सारा खून जाकर पृथ्वी की दिशा में शरीर में जम जाता है जो काफी गहरा लाल निशान बना देता है और लगता है कि ये चोट के निशान हैं। ) सुनंदा पुष्कर की मौत जहर से हुई लेकिन सुमित्रा के गले में फांसी के स्पष्ट निशान पाये गये जो यह बताते हैं कि मृत्यु लटकने से हुई। 
अब पुलिसिया कार्यवाही की तुलना करते हैं।
शशि थरूर केस में एफ आई आर एक साल तक दर्ज ही नहीं हुआ। गिरफ्तारी करना तो बहुत दूर की बात शशि थरूर को आज तक एक चींटी ने भी नहीं काटा। जबकि दूसरी तरफ बांसडीह में शव मिलते ही 9 जनवरी को ही पुलिस ने मृतका के पति सन्तोष राजभर, मृतका के ससुर दूबर राजभर एवं मृतका की सास शान्ती राजभर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।

नियम तो कहते हैं कि सूर्यास्त के उपरान्त किसी महिला की गिरफ्तारी नहीं की जा सकती,  किन्तु शान्ती राजभर समेत पूरे परिवार को रात भर थाने में गुजारने के बाद 10 जनवरी को जेल भी भेज दिया गया।

और अब जमानत होगी या नहीं ये तो पता नहीं लेकिन क्या पुलिस और सरकार वादी को खुश करने के लिए सारी मानवीय संवेदनाओं को इस कदर भूल सकती है कि यदि किसी परिवार में किसी की मृत्यु होती है तो उस परिवार को अन्तिम संस्कार समेत बहुत सारे कर्मकाण्ड करने होते हैं, तो क्या इतना भी अवसर नहीं दिया जाना उचित है ?

कानून कहता है कि जब तक आरोप सिद्ध न हो जाय तब तक आरोपी आरोपी होता है, निर्दोष होता है। और दूसरी तरफ सरकार व पुलिस कहती है कि जब तक सिद्ध न हो जाय तब तक आरोपी पूर्णतः दोषी होता है। और हमारा समाज भी इसी आधार पर चलता है।

क्या सन्तोष राजभर व पूरे परिवार की गिरफ्तारी तुरन्त इसलिए हुई क्योंकि वो झोपड़ी में रहता है। खाने के भी लाले हैं। अगर ये लाश झोपड़ी के बजाय किसी महल या फाइव स्टार होटल में पायी गयी होती तो भी क्या पुलिस का यही रवैया होता ?

अभी कुछ दिन पहले आप लोगों ने कुलदीप सिंह सेंगर का मामला सुना ही होगा कि बलात्कार का मुकदमा दर्ज होने में 11 महीने लगे थे। तब तक पीड़िता के पिता की हत्या और भाई की भी हत्या कर दी गयी थी। और सरकार बार बार सबूत न मिलने का राग अलाप रही थी। लेकिन सन्तोष राजभर के बारे में लाश मिलते ही सारे पुख्ता सबूत पुलिस के हाथ लग गये और पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेजकर अपनी पीठ थपथपा रही है।

जबकि वास्तव में जब घटना घटित हुई तो गांव वालों का कहना है कि सन्तोष राजभर अपनी मां के साथ अपने मामा को देखने सुखपुरा अस्पताल गया हुआ था। क्या पुलिस को गिरफ्तार करने से पहले इतनी जांच या पूंछतांछ नहीं करनी चाहिए थी ? गांव वालों का कहना तो यह भी है कि इन दोनों में कभी किसी प्रकार का झगड़ा नहीं सुना गया। हां ये अलग बात है कि मृतका ज्यादातर अपने मायके रहती थी और पिछली 1 जनवरी को ही ससुराल आयी थी।

वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में देखा जाय तो आत्महत्या के लाखों कारण हो सकते हैं और जब से ये मोबाइल हर घर में पंहुचा है तो आत्महत्याओं की जैसे बाढ़ सी आयी हुई है। फिर भी क्या मृतका के परिवार वालों को अपनी बहू का अन्तिम संस्कार करने तक की मोहलत न दिया जाना मानवीय मूल्यों को तार तार नहीं कर रहा है।

सोंचिए हम कौन सी व्यवस्था में जी रहे हैं। कि अगर अपराध का आरोप किसी बड़े आदमी पर लगे तो पुलिस व सरकार का कदम कुछ और होता है। और अगर आरोप किसी झोपड़ी वाले पर लगें तो रवैया कुछ और होता है। पुलिस व सरकार के लिए अपराध मायने नहीं रखता है बल्कि मायने रखता है कि आरोप किस पर लगा है।

 
अब अगर अदालत की बात करें तो यहां तो माशा अल्लाह समानता दिखायी देती है। कानून के आंख पर भले ही पट्टी बंधी हो लेकिन पट्टी के नीचे से जरूर झांक लिया जाता है। अभी याकूब मेनन की फांसी का मामला हो या कर्नाटक में सरकार बनाये जाने का मामला हो या मुख्यमन्त्री की समाधि का मामला हो, इन सब मामलों में चन्द घण्टे में याचिका लिए जाने से लेकर निपटाने तक का कीर्तिमान अदालत के पास है। वहीं दूसरी तरफ 100 करोड़ लोगों के अराध्य श्री राम जन्म भूमि के विवाद पर पट्टी इतनी सख्त है कि सामने श्री राम लला विराजमान दिखायी ही नहीं दे रहे हैं। 
भले ही सलमान खान की सजा बाद में नियत हुई हो पहले जमानत लिखी गयी हो लेकिन सन्तोष राजभर एवं पूरे परिवार को जमानत मिलने में सालों लगने वाले हैं। 

Support to Swatantra Prabhat Media

T & C Privacy

Loading...
Loading...

Comments