उतर गया है आज देश के मस्तक से वह भार...

उतर गया है आज देश के मस्तक से वह भार...

 

उतर गया है आज देश के मस्तक से वह भार।
सात दशक से ढोता था जिसको बेबस लाचार।।

जो कश्मीर हुआ करता था, भारत-अंग अभिन्न।
सात दशक से सिसक रहा था होकर वह अति खिन्न।

विवश हुए कश्मीरी पण्डित करने को गृह त्याग।
निज मर्यादा स्वत्व बचाने निकले बेबस भाग।

आतंकी घटनाओं से नित दहला करती घाटी।
अपने बेटों के लोहू से लाल हो गयी माटी।

जगह-जगह बम फटते, दगती जगह-जगह पर गोली।
मासूमों के खून से खेली जाती अकसर होली।

अपने-अपने स्वार्थ साधते नेता मौज मनाते।
भारत माँ के पूत लाड़ले नाहक जान गंवाते।

दस्यु दलों के भय से धरती आर्त-नाथ थी करती।
माता-बहन बेटियाँ सौ-सौ बार जहाँ थीं मरती।

तीन सौ सत्तर अनुच्छेद कुछ ऐसा विकट बना था।
अन्य प्रान्त से आकर बसना जिसके तहत मना था।

स्थानिक नेता स्वार्थ में अपने बने थे जिनके हामी।
नर-पिशाच वे रक्त के प्यासे या लोलुप अति कामी।

आत्म-शक्ति से रहित, क्षीण-बल वे लोलुप क्या करते?
देख रहे बेबस नागरिकों, सैन्य दलों को मरते।

भरत-भूमि के पुण्य फलित तब हुए भाग्य से ऐसे।
हुए अवतरित नेता मोदी और शाह जी जैसे।

कश्मीरी अबलाओं की शुचिता लौटाने आये।
आतंकी पशुओं से माँ को मुक्त कराने आये।

बदल गयी आमूल-चूल वह संविधान की धारा।
जिसने भारत की जनता का नैसर्गिक हक मारा।

गूँजी है ललकार अमित की भारत की संसद में।
ओ रे पाकिस्तान तू रहना अब बस अपनी हद में।

 हमने पुनः बनाया है जम्मू -कश्मीर का नक्शा।
केन्द्र करेगा इनकी औ लद्दाख क्षेत्र की रक्षा।

आओ सब कश्मीर चलें अब भू-संपत्ति लिखाने।
विस्थापित जो भूमि-पुत्र हैं उनको पुनः बसाने।

बंदूकों बारूद की खेती बहुत हो चुकी यारो।
चलो-चलो कश्मीर की धरती का फिर भाग्य संवारो।

वरद हस्त मोदी नरेन्द्र का, दृढ़ संकल्प अमित है।
तब केवल कश्मीर नहीं, समझो सब जगत विजित है।

भूले वह इतिहास, इबारत अब यह नयी पढ़े हम।
स्वर्ग अगर कश्मीर तो आओ, उसकी राह बढ़ें हम।

news@swatantraprabhat.com

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