नारी को अवला ना समझो, और न समझो नादान

नारी को अवला ना समझो, और न समझो नादान

नारी

नारी को अवला ना समझो, और न समझो नादान।

आज के युग में कदम मिलाकर, चलते नर और नारी एक समान||

नारी तेरे रूप अनेक
बने माता-बहन और संतान

अपने दो हाँथो से दुनिया भर के ,करती है सब काम|

जिस घर में नारी ना हो, वो घर है नरक समान||

नारी त्याग तपस्या की मूरत,नितदिन करती है बलिदान।

यम से जीत के वापस लायी अपने पति के प्रान।।

पुरुष प्रधान जगत में नारी, लोहा अपना मनवाये।
मर्दों बाले काम सभी वो करके दिखलाये।।

            कवि 
मासूम अजय गुमराह (हरदोई)

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