किसी के निगाहों की तानाशाही तो नहीं

किसी के निगाहों की तानाशाही तो नहीं

किसी के निगाहों की तानाशाही तो नहीं 

ज़माना आदतन जिसे मोहब्बत कहता है 

 

सही कहने को कहे और सही कह दें गर 

फिर तो बुरी है हमारी शोहबत कहता है 

 

अपने चाँद को देखा न आसमाँ के चाँद को 

ऐसी होती है ईद कौन सी इबादत कहता है 

 

किसी की जान जाती है तुम्हारी भूख को 

बेहया हुआ हज़रात जिसे दावत कहता है 

 

सलिल सरोज 

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