खाकी सुरक्षा नहीं, लोगों में फैला रही खौफ

खाकी सुरक्षा नहीं, लोगों में फैला रही खौफ

खाकी सुरक्षा नहीं, लोगों में फैला रही खौफ

शहर की जनता अपने आप कर रही असुरक्षित महसूस

पुलिस के आलाधिकारियों को नहीं है जनता दर्द का ध्यान

ललितपुर। Ravi shankar sen

पुलिस को सुरक्षा के लिए थानाक्षेत्रों में तैनाती दी गयी है, जहाँ पर कानून का पालन करते हुये, लोगों को न्याय दिला सकें। लेकिन वर्तमान में पुलिस द्वारा लोगों में खौफ फैला कर अवैध वसूली कर रहे हैं।

जबरन कानून खौफ फैलाकर लोगों को डराया जा रहा है। तो वहीं वर्तमान पुलिस की कार्यप्रणाली के चलते लोग अपने आप को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यही कारण है कि पीडि़त अपने उत्पीडऩ के खिलाफ पुलिस के पास न जाकर जिला प्रशासन के दरबाजे पर जा रहा है। 

उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े इलाके बुन्देलखण्ड में सबसे आखरी पायदान पर जनपद स्थित है। यहाँ पर गरीबी अशिक्षा और बेरोजगारी चरम पर है। जनपद में अधिकाँश विवाद जमीनी सम्बन्धी है। अधिकाँश विवाद तो मामूली होते हैं। कोतवाली पुलिस उसी सामान्य घटनाक्रम का बेसबरी से इंतजार करती है

जिसका कारण उक्त घटनाक्रम को कोतवाली पुलिस ने अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। शहर कोतवाली में मोबाईल चोरी सिम गिर जाने के प्रार्थना पत्र पर कोतवाली की मुहर लगने भर से शुरू होने वाला खाकी की कमाई का खेल मारपीट से लेकर छिनैती, लूट, चोरी, जुये, अबैध शराब से लेकर कई बडे मामलो तक में फैला हुआ है।

हालिया उदाहरण शहर के नामचीन होटल आर्यन इन में हुआ हादसा है जहां दो मजदूरो की मौत के आरोपी को खाकी खुला संरक्षण दिये रही। नगर के चारो ओर कोतवाली के संरक्षण में बिक रही अबैध शराब की कहानी किसी भी आम आदमी से सुनी जा सकती है। जिले में चल रही जुये की फड़ों को किसी से खतरा नही क्योकि कोतवाल यहां भी महिरवान है। ये तो वे किस्से है जिन्हे हर आम व्यक्ति से आप सुन सकते है उसके बाद वे मामले है जो केवल कुछ जानकारो को ही पता है

जिनमें कोतवाल वादी को आरोपी और आरोपी को वादी सिद्ध करने में बृहस्त रखते है। कोतवाली में आने वाले फरियादी के साथ हुई घटना नही उनका दिया नजराना तय करता है कि मामले में कौन सी धारा लगनी है ऊपर से यदि आरोपी का नजराना भी आ जाता है तो कोतवाली न्यायालय में तबदील हो जाती है दोनो पक्षों को कोर्ट कचहरी का खौफ दिखा

मामले में कोतवाल दंडाधिकारी की भूमिका में आ जाते है और कानून व्यवस्था बनाने वाली पुलिस खुद ही न्यायाधिकारी की भूमिका निर्वहन करते हुये मामले का निस्तारण कर देते है। ऐसे एक नहीं सैंकड़ो मामले हैं जिनमे कोतवाल ने न्यायाधीश बन मामले का निस्तारण कर दिया पर बाद मे फरियादी के वास्तविक न्याय के लिए न्यायालय के पास जाना होता है।

वहां से खाकी को अपने कार्य मे हीलाहवाली बरतने पर फटकार तो लगती ही साथ साथ ही यह भी ज्ञात करा दिया जाता हैं कि उनका काम कानून का पालन कराना है ना कि न्यायाधीश बनना। लेकिन फिर भी पुलिस अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं ला पा रही है।

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