गर्मी शुरू होते ही चंद्रावल नदी की धारा में लगा विराम

गर्मी शुरू होते ही चंद्रावल नदी की धारा में लगा विराम

दो दशक पूर्व रात दिन कलकल करके बहने वाली चंद्रावल नदी अब गर्मियों के आते ही पानी के नाम पर महज रेत के नाम पर तब्दील हो जाती है। गर्मियों में कहीं भी अविरल धारा नजर नहीं आती है।

महोबा से आई चंद्रावल नदी जिले के मौदहा एवं सुमेरपुर विकासखंड के गांवों के बीच से गुजरकर बांदा जनपद की सीमा में जाकर केन नदी में समाहित हो जाती है। 1976 एवं 1984 में आई बाढ़ के तमाम किस्से इस नदी की तबाही के आज भी मौजूद है।

1984 की बाढ़ में इस नदी पर सागर मार्ग पर बना पुल ध्वस्त हो गया था। इसके ध्वस्त होने से यूपी एमपी का संपर्क टूट गया था। फौरी राहत देने के लिए सेना ने एक सप्ताह के अंदर अस्थाई पुल बनाकर राहत दी थी। 1976 की बाढ़ में इस नदी ने मौदहा बांदा मार्ग पर सिजनौड़ा गांव के पास बने भारी भरकम पुल की छत को बहा दिया था। जिसकी छत आज भी सबूत के तौर पर नदी में मौजूद है। इसके बाद इसने ज्यादा तबाही तो नहीं मचाई। पर बरसात के दिनों में यह मुसीबत जरूर बनती रही।

पिछले दो दशक से यह नदी दुर्दशा का शिकार है। कभी वर्षभर लगातार कल कल करके बहने वाली यह नदी अब गर्मी शुरू होते ही पानी के लिए स्वत: तरसने लगती है और इसमें पानी की जगह धूल उड़ने लगती है। जनपद की सीमा में आने के बाद इसमें तमाम बड़े नाले भी मिलते है, लेकिन यह भी इसको गर्मी अवरल धारा नहीं दे पा रहे है। मौदहा क्षेत्र में बडेरी, श्यामनाला, सुमेरपुर क्षेत्र में कड़ोरन नाला इस नदी में समाहित होते हैं।

इसके बाद भी इसमें गर्मी आते आते पानी का अभाव हो जाता है। मौदहा क्षेत्र में इस पर चेकडैम भी बनाये गये पर खाऊ कमाऊ नीति के तहत बनाए गए यह चेकडैम भी इस नदी की अविरल धारा को नहीं उबार सके। यही कारण है कि गर्मी शुरू होते ही इसकी अविरल धारा में विराम लग जाता है। मुंडेरा के प्रधान रामकिशोर परेहटा के उमाशंकर यादव, किसवाही के रामबाबू, धुंधपुर के कालीदीन विद्यार्थी, कैथी के प्रधान सतीश चंद्र शिवहरे का कहना है कि गर्मी में नदी में पानी ढूंढना भी टेढ़ी खरी के समान होता है।

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