चयनात्मक मनुवाद।

चयनात्मक मनुवाद।

चयनात्मक मनुवाद।


भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में मनुवाद को चयनात्मक रूप से स्थान दिया गया है। और समाज में सबसे अधिक गाली मनुवाद को ही दिया जाता है।

मैं यूं ही एक लेख पढ़ रहा था तो मनुवाद को सैकड़ो गाली साहब दे रहे थे और नाम के साथ यादव शब्द लगा हुआ था। तुरन्त मेरे दिमाग में सवाल कौंधा कि यदि इन साहब को मनुवाद से इतनी चिढ़ है तो ये यादव जाति का अपने नाम के साथ क्या प्रयोग करने का अधिकार रखते हैं ?

फिर जितना मैं सोंचता गया उलझता गया और अपने कई जानकार योग्य मित्रों से इस पर बात किया तो सभी ने भारतीय जाति व्यवस्था की उत्पत्ति मनु स्मृति से ही बताते रहे।

मैने भी बहुत खोजने का प्रयास किया लेकिन हर जगह जाति का आधार मनु स्मृति ही मिलती है। अब सवाल ये उठता है कि एक तरफ तो आप अपने आपको यादव पाण्डेय तेली ठाकुर आदि लिखना भी है और दूसरी तरफ मनु वाद या मनु स्मृति को गाली भी देना है तो ये चयनात्मक उपयोग तो सीधे सीधे दोगलापन कहलाता है। 

अर्थात एक तरफ मनुस्मृति के आधार पर अपने आपको चमार सिद्ध करके प्रमाण पत्र लेकर लाभ भी लेना है तो दूसरी तरफ मनुवाद को गाली भी देना है।

आखिर कब तक ये चयनात्मक मान्यता या चयनात्मक बुराई होती रहेगी। आज पूरे देश में असन्तोष एवं सम्पूर्ण हिन्दू समाज के खण्ड खण्ड टूटने का कारण आरक्षण व अन्य अत्याचारी कानून बने हुए हैं।

और ये सारे कानून हमारे मनुस्मृति में उल्लिखित वर्ण व्यवस्था से ही पोषित होते हैं। फिर पूरे दिन मनुवाद को गाली क्यों दी जाती है इसका कारण समझ में नहीं आता है।


इसको और गहराई से समझना हो तो मान लीजिए कि कोई व्यक्ति एस डी एम महोदय के कार्यालय जाकर अपने चमार या अहीर होने के प्रमाण पत्र की मांग करता है

तो ऐसा कौन सा पैमाना एस डी एम साहब के पास होता है जिसके आधार पर एस डी एम साहब प्रमाणित कर देते हैं कि सामने आया हुआ व्यक्ति अहीर जाति का है, या चमार जाति का है ?

न तो एस डी एम साहब डी एन ए सैम्पल रखे हुए होते हैं जिससे आने वाले का डी एन ए मिलान कर लेते हैं और न ही एस डी एम साहब के पास यह प्रमाणित करने का आधार होता है कि चमार जाति का ये ब्लड ग्रुप होता है।

केवल पिता के नाम के साथ चमार या अहीर होने के आधार पर ही पुत्र को प्रमाण पत्र जारी कर देते हैं।

अब इसका मतलब जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था तो वैसे कहीं नहीं मिलती है फिर भी जन्म आधारित ही मान लें तो अब तो 497 भी खत्म हो चुका है तो इस बात की क्या गारण्टी है कि आने वाला उसी जाति का है

जिस जाति का होने का वह दावा कर रहा है ? और मान लें कि उसके पिता के नाम में वह जाति लिखा होने के आधार पर प्रमाण पत्र जारी करते हैं तो सवाल उठता है कि उस व्यक्ति के पिता को जाति के स्थान पर अहीर या चमार या अन्य कोई जाति लिखने का आधार देने वाला ग्रन्थ कौन सा है

तो एक ही जवाब निकलकर आता है कि मनु स्मृति। लेकिन ये साहब तो सुबह से शाम तक मनुस्मृति को गाली देते नहीं थकते हैं। और हमारे देश में मनुस्मृति का विरोध कर कर के सरकार बनती रही हैं।

हमारा देश भी संविधान से चलता है और तब संविधान आंशिक मनुस्मृति को मान्यता कैसे देता है ? यदि मनुस्मृति गलत है तो पूरी गलत है फिर न तो किसी को माथे पर बिन्दिया लगाना चाहिए और न ही ब्राम्हण क्षत्रिय सूद्र या वैश्य लिखना चाहिए।

और यदि मनुस्मृति को सही मानना है तो सुबह से शाम तक मनुस्मृति को गाली क्यों ? ये चयनात्मक मनुस्मृति कब तक चलेगी देश में। हिन्दू धर्म को इस जातिवादी व्यवस्था ने 7500 टुकड़ों में बांट चुकी है और अभी कितने टुकड़े करने बाकी हैं पता नहीं।

अभी तक ओ बी सी के नाम पर 27 प्रतिशत आरक्षण की वजह से कुछ जातियां एक थीं तो उन्हें भी कोटा के अन्दर कोटा करके बांटने का युद्ध स्तर पर प्रयास जारी है फिर क्यों नहीं पूरी मनुस्मृति को लागू कर दिया जाता है

यह विचारणीय प्रश्न है। और अगर मनुस्मृति को नहीं मानना है तो अपने आगे कोई भी सरनेम लगाने का आपको कतई अधिकार नहीं है।

मनुस्मृति का विकृत रूप पेश करके बैमनस्य फैलाने वाले लोग यह क्यों नहीं बताते हैं कि अधिकतर ब्राम्हण भगवान राम का भोग अपने ठाकुर जी का भोग लगाये बगैर भोजन भी ग्रहण नहीं करते हैं तो भगवान राम के कथनानुसार उनके वंशज आज भी एक छोटे से छोटे ब्राम्हण को सादर पैर छूकर प्रणाम करके सम्मान अर्पित करते हैं। यह सामाजिक समरसता और कहां मिलती है।

इस सम्बन्ध में एक जनहित याचिका योजित करने का मन बना रहा हूं। कि या तो मनुस्मृति आधारित जाति व्यवस्था समाप्त किया जाय या फिर जाति व्यवस्था के मूल मनुस्मृति को पूर्णतः लागू किया जाय। यदि आवश्यक जानकारी आपके पास हों तो अवश्य देने का कष्ट करें।

आशुतोष पांडे 

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