विवाहिता ने फाँसी लगाकर कि आत्महत्या

विवाहिता ने फाँसी लगाकर कि आत्महत्या

विवाहिता ने फाँसी लगाकर कि आत्महत्या

हल्दी बलिया थाना क्षेत्र के पिन्डारी गांव में गुरुवार की देर शाम एक विवाहिता ने फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली।मृतका के भाई व पुलिस के सामने दरवाजा तोड़कर शव को नीचे उतारा गया।सूचना पाकर क्षेत्राधिकारी बैरिया नायब तहसीलदार सदर जया सिंह थानाध्यक्ष हल्दी सुनील सिंह ने मौके पर पहुंचकर आवश्यक जाँच पड़ताल की।

इस दौरान पुलिस ने मृतका के शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया।मृतका के भाई की तहरीर पर पुलिस ने संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है।साथ पति व ससुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

सिकंदरपुर थाना क्षेत्र के सीकीया गांव निवासी मोहन यादव की पुत्री अंकिता 24वर्ष की शादी करीब दो साल पहले हल्दी थाना क्षेत्र के पिन्डारी गांव निवासी रामदेव यादव के पुत्र मनोज यादव के साथ हुई थी। अंकिता जिस समय गांव आई सब कुछ ठीक ठाक था।बाद में अंकिता को लेकर परिवार में तनाव बढ़ने लगा।

मनोज यादव के मुताबिक वह ट्रक चलाकर बुधवार को अपने घर पिन्डारी आया गुरुवार की सुबह वह अपनी पत्नी से कहा कि शाम को पुनः ट्रक पर जाना है,कपड़ों को साफ कर दो। 11 बजे तक जब कपड़ों का धुलाई नहीं हुआ तो वह स्वयं ही कपड़ा धो लिया और पत्नी से बोला जब ये सब काम हमें ही करना है तो तुम्हारा यहाँ क्या काम है।

तुम मायके चली जा।यह कहकर मनोज अपने छोटे भाई का इलाज कराने के लिए लेकर जिला मुख्यालय चला गया। मनोज के पिता खेत की बुआई कराने के लिए बीज खरीदने चला गया।घर में कोई नहीं था,उसी समय अंकिता कमरे को अंदर से कुंडी लगा दी।

और करकट के बास में दुपट्टा बाधकर पलंग से झूल गई। अंकिता की सास ने दरवाजा खटखटाया तो कोई आवाज नहीं आई।अनहोनी की आशंका में किसी तरह मनोज व रामदेव को फोन पर सूचना दी।बगल के कमरे से देखा गया तो अंकिता फंदे पर झुली थी।मनोज ने अपने ससुराल वालों को और पुलिस को इस बात की सूचना दी।ससुराल पक्ष व पुलिस के सामने दरवाजा तोड़ा गया। अंकिता का भाई सोनू यादव की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पति मनोज व ससुर रामदेव को संबंधित धाराओं में न्यायालय में चालान कर दिया।


सवाल ये उठता है कि जब मनोज ने स्वयं सूचना देकर पुलिस व मायके वालों को बुलाया तब भी मनोज के पूरे परिवार को गिरफ्तार कर लिया गया। जबकि उच्चतम न्यायालय का भी कहना है कि आटोमैटिक गिरफ्तारी पर अंकुश लगाया जाना जरूरी है। एक तरफ पुलिस दहेज हत्या के मामलों में तुरन्त पूरे परिवार को गिरफ्तार करके जेल भेज देती है।

और दूसरी तरफ अदालत में मुकदमे के दौरान जज साहब पूंछते हैं कि क्रियाकर्म किसने किया। वैसे भी यदि किसी की पत्नी की मौत किसी भी परिस्थिति में हुई हो तो क्या उसे दाह संस्कार करने तक की मोहलत न दिया जाय क्या यह न्यायसंगत है ? हमारे हिन्दू धर्म और शास्त्र कहते हैं कि किसी भी शादी सुदा महिला को मुखाग्नि देने का पहला अधिकार पति का होता है। और पति के जीवित रहते हुए किसी और के द्वारा दी गयी मुखग्नि आत्मा की शांति नहीं दिला सकती।

ये अलग विषय है कि मनोज या उसका परिवार दोषी है या नहीं पता नहीं जांच के उपरान्त ही पता चलेगा वह भी तब जब ईमानदारी से जांच की जायेगी। किन्तु क्या सरकार द्वारा व जनसामान्य द्वारा इस तरह दहेज कानूनों का दुरूपयोग जायज है ? क्या इस तरह जेल जाते हुए पतियों और उनके परिवारों की दुर्दशा देखकर अगल बगल की बहुएं गुस्से में आकर आत्महत्या करने के लिए प्रेरित नहीं होती हैं ?

सरकार और कानून आत्महत्या को कैसे सही ठहराने का प्रयास कर सकते हैं। अगर किसी को कोई भी परेशानी हो तो उसे परेशानी फेस करना अपनी परेशानी को जायज चैनेल तक पंहुचाना जरूरी है न कि आत्महत्या कर लेना। सरकार ने 1090 या डायल 100 क्यों बनाया हुआ है क्या यह विचारणीय नहीं है ? अगर आत्महत्याओं का विरोध समाज नहीं करेगा तो इसी तरह किसी न किसी घर में आत्महत्यायें होती ही रहेंगी क्योंकि इस दुनिया में कोई किसी दूसरे को सन्तुष्ट नहीं कर सकता चाहे वह पति हो या पत्नी हो।

और आत्महत्या के मामलों में भले ही मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने कहा हो कि लाखों कारण हो सकते हैं किन्तु आज तक हर एक महिला की आत्महत्या की एक ही वजह पायी जाती है दहेज की मांग। और हर पुरूष की आत्महत्या की वजह अनेक होती है जैसे तंगहाली, बेरोजगारी, किसान, कर्ज का बोझ वगैरह वगैरह ।

जबकि एन सी आर बी के वर्ष 2015 आंकड़े कहते हैं कि प्रतिवर्ष लगभग 42000 शादीसुदा महिलायें आत्महत्या कर रही हैं वहीं 92000 पुरूष आत्महत्या कर रहे हैं। बाद में जाकर भले ही दहेज मृत्यु के 95 प्रतिशत मामले झूंठे साबित हो जाते हों किन्तु हमारा समाज 100 प्रतिशत पति व उसके परिवार को सबसे बड़ा दोषी मान लेता है।

हमें किसी भी कीमत पर आत्महत्या के खिलाफ एक युद्ध लड़ने की जरूरत है। और युद्ध का प्रकार शायद यही हो सकता है कि आत्महत्या के बदले किसी दूसरे को दोषी न ठहराया जाय। वरना आत्महत्या में ये प्रमोशन का कार्य करता है।

और आप की जानकारी के लिए बता दें कि इतनी मौत किसी आतंकवादी घटना या किसी युद्ध में आज तक नहीं हुई हैं जितनी प्रत्येक वर्ष आत्महत्या से होती हैं। विचारणीय प्रश्न है कि यदि कोई आपको मारने पर उतारू हो तो आपको बचाया जा सकता है। किन्तु यदि आप स्वयं खुद को मारने पर उतारू हैं तो आपको कौन बचा सकता है शायद भगवान भी नहीं।

इसलिए आत्महत्या के बदले तुरंत गिरफ्तारी कतई उचित नहीं है। जांचोपरांत यदि दोष पाया जाता है तो उसे जो चाहे दण्ड दिया जाय। किन्तु दोष सिद्धि से पहले ही दोषियों जैसा व्यवहार कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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