बाके बिहारी ने बनाया नन्हे मुन्ने बाल गोपाल जन्माष्ठमी में मन्दिरो में सजे धजे मिले भगवान कृष्ण

     बाके बिहारी ने बनाया नन्हे मुन्ने बाल गोपाल      जन्माष्ठमी में मन्दिरो में सजे धजे मिले भगवान कृष्ण

सनी गोस्वामी / नैज घोषी

फतेहपुर :-  भगवान के दर्शन करने के लिए सभी उतावले होते हैं सभी चाहते हैं कि जल्द से जल्द उनको भगवान के दर्शन मिले और जब दिन भगवान के जन्म का हो उस दिन लोगों की आंखों में भगवान का चेहरा बसा होता है वह जल्दी से जल्दी चाहते हैं कि भगवान के चरण स्पर्श करें और अपनी मनोकामना मांगे , फतेहपुर जिले का एक प्रसिद्ध मंदिर जिसे बांके बिहारी का मंदिर कहते हैं

आज से करीब लगभग 250 वर्ष पहले इस मंदिर का निर्माण कराया गया था और लगातार इस मंदिर में भक्तों द्वारा पूजा-अर्चना कराई जा रही थी लेकिन किसी ने भी इसकी देखरेख नहीं की मंदिर निर्माण मंदिर का निर्माण करा अपना जीवन समाप्त कर लिया उसके बाद यथा - कथा किसी पुजारी ने इसकी देखरेख की लेकिन कब्जा करने वालों की नजर लगातार इस मंदिर पर बनी रहे पुजारी के जाने के बाद दबंग किस्म के लोगों ने इस मंदिर के ऊपर कब्जा कर अपना निवास स्थान बना लिया और मंदिर की जमीन पर अपना घर दुकान और अन्य निर्माण कार्य कराने लगे लेकिन उनकी यह दुर्बुद्धि ज्यादा दिन नहीं चली क्योंकि जिले में आगमन हो गया था

जिलाधिकारी अंजनेय कुमार सिंह का उन्होंने जिले में आते ही जिले को साफ - स्वच्छ बनाने की शुरुआत की और जिले की काफी सड़कों से अतिक्रमण हटवा दिया जब उनको इस मंदिर के बारे में पता चला तो उन्होंने इस मंदिर प्रांगण को भी खाली करा दिया और जिले के लेखपाल के हवाले इस मंदिर को कर दिया वही मंदिर के देखरेख के लिए पुजारी भी नियुक्त कर दिए गए ।

     सन 2018 में जब आंजनेय कुमार सिंह का फतेहपुर जिले में आगमन हुआ था यह मंदिर अपने बुरे समय पर आंसू बहा रहा था लेकिन अब हाल यह है कि मंदिर का जीर्णोद्धार हो गया है और मंदिर में पुराने शिव मंदिर को नया कर दिया गया है साथ ही साथ वह कब्जे वाले घर को नष्ट कर दिए गए इसके अलावा वहां पर नारायण दास समाधि कुटी के साथ-साथ हनुमान मंदिर और दुर्गा मंदिर का भी निर्माण कराया जा रहा है साथ ही साथ मंदिर में कार्य कर रहे मजदूरों से जब बात की गई तो उन्होंने साफ शब्दों में कह दिया किस मंदिर को हम फतेहपुर का सबसे आलीशान मंदिर बनाएंगे और इसकी चमक ऐसी होगी कि जिले का कोई भी मंदिर नहीं ले पाएगा मंदिर में मौजूद समाजसेवी प्रदीप गर्ग से जब बात की गई तो उन्होंने बताया कि इस मंदिर के निर्माण कार्य में प्रशासन पूरी मदद कर रहा है साथ ही साथ जिले के जिलाधिकारी रह चुके अंजनेय कुमार सिंह , और आला अधिकारी जेपी गुप्ता तहसीलदार विदुषी सिंह व अन्य अधिकारी भी लगे रहते हैं ताकि मंदिर में अवैध कब्जा पूर्णता हटाया जा सके और मंदिर को संरक्षित किया जा सके आपको बता दें कि मंदिर में  काफी संरक्षण हुआ है मौसम के अनुसार वृक्षारोपण भी होता रहता है मंदिर में एक प्रांगण ऐसी भी बनाया गया है जहां गरीब और दुखियों की शादी कराई जाती है ।

     मंदिर प्रशासन में जिला वितरक एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रदीप गर्ग व सुनीता गर्ग लगातार मंदिर की देखभाल करते हैं और प्रशासन और खुद की इच्छा शक्ति से मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं भले ही कुछ लोग इस मंदिर के पीछे कब्जा करने का मकसद बनाकर रखते हैं लेकिन अगर प्रशासन लगातार इस मंदिर का संरक्षण करता रहेगा तो जरुर 1 दिन ऐसा आएगा जब फतेहपुर जिले में इस बांके बिहारी मंदिर को पर्यटन स्थल घोषित किया जा सकता है कारीगर राजस्थान की कारीगरी इस मंदिर प्रांगण में करने के लिए आए हैं और जिस तरह से पत्थरों को काटकर मंदिर को सजा रहे हैं वह देखने काबिल है और उनकी कारीगरी एक अनोखी कारीगरी है । 

  बाँकेबिहारी जी का संक्षिप्त इतिहास

श्रीधाम वृन्दावन, यह एक ऐसी पावन भूमि है, जिस भूमि पर आने मात्र से ही सभी पापों का नाश हो जाता है। ऐसा आख़िर कौन व्यक्ति होगा जो इस पवित्र भूमि पर आना नहीं चाहेगा तथा श्री बाँकेबिहारी जी के दर्शन कर अपने को कृतार्थ करना नहीं चाहेगा। यह मन्दिर श्री वृन्दावन धाम के जैसा एक सुन्दर इलाके में स्थित है। कहा जाता है कि इस मन्दिर का निर्माण स्वामी श्री हरिदास जी के वंशजो के सामूहिक प्रयास से संवत १९२१ के लगभग किया गया।

 

मन्दिर निर्माण के शुरूआत में किसी दान-दाता का धन इसमें नहीं लगाया गया। श्रीहरिदास स्वामी विषय उदासीन वैष्णव थे। उनके भजन–कीर्तन से प्रसन्न हो निधिवन से श्री बाँकेबिहारीजी प्रकट हुये थे। स्वामी हरिदास जी का जन्म संवत 1536 में भाद्रपद महिने के शुक्ल पक्ष में अष्टमी के दिन वृन्दावन के निकट राजपुर नामक गाँव में हूआ था। इनके आराध्यदेव श्याम–सलोनी सूरत बाले श्रीबाँकेबिहारी जी थे। इनके पिता का नाम गंगाधर एवं माता का नाम श्रीमती चित्रा देवी था। हरिदास जी, स्वामी आशुधीर देव जी के शिष्य थे। इन्हें देखते ही आशुधीर देवजी जान गये थे कि ये सखी ललिताजी के अवतार हैं तथा राधाष्टमी के दिन भक्ति प्रदायनी श्री राधा जी के मंगल–महोत्सव का दर्शन लाभ हेतु ही यहाँ पधारे है। हरिदासजी को रसनिधि सखी का अवतार माना गया है। ये बचपन से ही संसार से ऊबे रहते थे। किशोरावस्था में इन्होंने आशुधीर जी से युगल मन्त्र दीक्षा ली तथा यमुना समीप निकुंज में एकान्त स्थान पर जाकर ध्यान-मग्न रहने लगे। जब ये 25 वर्ष के हुए तब इन्होंने अपने गुरु जी से विरक्तावेष प्राप्त किया एवं संसार से दूर होकर निकुंज बिहारी जी के नित्य लीलाओं का चिन्तन करने में रह गये। निकुंज वन में ही स्वामी हरिदासजी को बिहारीजी की मूर्ति निकालने का स्वप्नादेश हुआ था। तब उनकी आज्ञानुसार मनोहर श्यामवर्ण छवि वाले श्रीविग्रह को धरा को गोद से बाहर निकाला गया। यही सुन्दर मूर्ति जग में श्रीबाँकेबिहारी जी के नाम से विख्यात हुई यह मूर्ति मार्गशीर्ष, शुक्ला के पंचमी तिथि को निकाला गया था। अतः प्राकट्य तिथि को हम विहार पंचमी के रूप में बड़े ही उल्लास के साथ मानते है।युगल किशोर सरकार की मूर्ति राधा कृष्ण की संयुक्त छवि या ऐकीकृत छवि के कारण बाँके बिहारी जी के छवि के मध्य ऐक अलौकिक प्रकाश की अनुभूति होती है,जो बाँके बिहारी जी में राधा तत्व का परिचायक है।

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