जातिगत व्यक्तिगत आरोपो के आगे, चुनाव से पहले बुनियादी जरूरत हुआ गायब

जातिगत व्यक्तिगत आरोपो के आगे, चुनाव से पहले बुनियादी जरूरत हुआ गायब

देश की जरूरतों के हिसाब से देश नहीं चल रहा बल्कि एक व्यक्ति विशेष के लिए देश को चलाया जा रहा है. 2014 से लेकर अब तक बुनियादी जरूरतों से देश का ध्यान भटका कर सिर्फ और सिर्फ इधर उधर की बातों में गुमराह करने का ठेका मानो ले लिया गया हो. 2014के मेनिफेस्टो में जिक्र जिस बात की हुई थी चुनाव होने से 2 दिन पहले नीच शब्द पर आकर सिमट गया था. आज एक बार फिर प्रथम चरण के चुनाव हो चुके दूसरे तारीखो को होने वाले चुनाव से ठीक पहले एक बार फिर सभी बुनियादी विषयों से ध्यान हटाकर गाली देने वाले शब्द पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. लेकिन समझ में शायद देश को यह नहीं आ रहा होगा कि रोटी कपड़ा मकान बेरोजगारी शिक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं से ध्यान हटाने का हर चुनाव से पहले एक नया पैंतरा आखिर क्यों शामिल कर दिया जाता है.

एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर एक नेता दूसरे नेता पर  एक कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्ता पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर चुनाव में जिस हथकंडे का उपयोग कर रहा है क्या उससे भारत जैसे देश के लिए उचित है. जिस देश में लोगों के पास सुबह उठने के बाद अगले पल क्या घर में बनेगा, क्या बच्चे पहनेंगे, स्कूल जाएंगे कि नहीं, रोग हो जाए तो इलाज का समुचित व्यवस्था कैसे होगा, बीमार होने के बाद घर का खर्च कैसे चलेगा, रोजगार के साधन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दिख नहीं रहे, मौसम ने साथ नहीं दिया तो साल भर का अनाज कहां से आएगा, बारिश हो जाए तो सर पर छत का इंतजाम नहीं है आगे भी बहुत सवाल है लेकिन देश में तो जरूरी मुद्दों को दरकिनार करके चुनाव के ठीक पहले निजी आरोप प्रत्यारोप का दौर 2019 के चुनाव में एक बार फिर चल पड़ा है.लेकिन साहब देश आप लोगों के आरोप प्रत्यारोप से नहीं चलता अगर आपके पास अपने व्यक्ति विशेष को बढ़ावा देने के अलावा कोई काम नहीं हो तो, आज देश का युवा चाहता है आप लोग संसद  और विधानसभा खाली कर दें. ताकि नए युवा जरूरतों के साथ अपने बुजुर्गों, मां बेटियों के हिसाब से देश को चलाने का बीड़ा कम से कम उठा सकें. किसी भी नेता के ऊपर कुछ भी कहने से गरीबों के घर का खर्चा नहीं चलता. इस बात को या तो हमारे नेता समझना नहीं चाहते या हमें समझ में आ जाए इससे पहले एक प्रोपेगंडा देश में फैला देना आप लोगों का प्रथम कर्तव्य बन जाता है.

136 करोड़ आबादी वाले देश में चुनाव के समय मुद्दा बन जाता है एक दूसरे के ऊपर लगाए गए आरोप. आरोप लगाना और तय करना यह दोनों ही काम हमारे नेता बखूबी कर देते हैं और इसी चक्रव्यूह में हमारी जनता सिद्धांतों से हटते पार्टियों के नेताओं पर गौर नहीं कर पाती और ठीक चुनाव से पहले जातिगत या व्यक्तिगत पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपना मतदान कर देती है. जिसकी वजह से हर बार की चुनी हुई सरकार 5 साल की शासन सत्ता में बड़े ही आराम से जनता को गुमराह करके अगले बार फिर चुनावी माहौल में गरीबी भूखमरी  बेरोजगारी देशहित राजहित छोड़, कौन किस को गाली दे रहा या किस को कौन नीच कह दिया जैसे पर्सनल अटैक के ऊपर जनता अपने अधिकार का दुरुपयोग कर देती है. नेताओं के लिए बड़ा ही आसान हो जाता है इन बातों पर आकर हमारे जनता का सहानुभूति वाला मत डलवा लेना और शासन सत्ता पर फिर काबीज हो जाते हैं. 

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