व्यक्तिगत आरोपों की झड़ी लगा, देश के विकास में लगे हिंदुस्तानी नेता

व्यक्तिगत आरोपों की झड़ी लगा, देश के विकास में लगे हिंदुस्तानी नेता

अभी वर्तमान समय में सांसद का चुनाव देश के भीतर चल रहा है सांसद प्रत्याशी लोक लुभावने बातें और निजी प्रहार कर देश और क्षेत्र की जनता को अपने पाले में वोट करने का अपील भी बड़े पैमाने पर कर रही है. हर पार्टी अपने स्टार प्रचारक की बात जनता के बीच पहुंचाने और जनसभा आयोजित करने में लगा है.

जनता भी क्षेत्रीय नेताओं के बहकावे में आकर जनसभा और रैलियों में भाग लेने डिब्बे की पूरी और बाइक में तेल पाकर खुश हो रही है. तो एक तरफ देश की मीडिया इस भीड़ तंत्र को किसी भी पार्टी का वोट बैंक बताकर पार्टियों को खुश करने से पीछे नहीं हट रही है.

लेकिन उस भीड़ को इकट्ठा कर आखिर नेता जनता की जरूरतों की बजाय दो समुदाय, नेताओं के निजी जीवन और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप पर जीवन से चुनाव का महत्व ही गायब कर देते हैं. नेता भी जानते हैं पिछले 5 वर्ष हुआ कुछ नहीं, तो सहानुभूति में ही सही, कम से कम वोट मिल जाए. देश प्रदेश  का विकास और जरूरतें तो पूरी होती रहेगी. जनता भी नेताओं के आरोप प्रत्यारोप को निजी जीवन से जोड़कर चुनाव में सहानुभूति के वोट देने से नहीं रोक पाती है. 

इस तरह की बातों को फैलाने का काम भी एक तंत्र कर रहा है जिसे  सोशल मीडिया  कहते हैं और सोशल मीडिया की बात ही निराली एक दूसरे को बड़ा छोटा दिखाने का मानो ठेका ही ले रखा हो. जरूरत से ज्यादा प्रचार का साधन बन चुका है. व्यक्तिगत जीवन पर आरोप लगा नहीं, तब तक भक्त पूर्ण रूपेण काम करने लगते हैं मतलब उनकी रुपयों के बदौलत चलने वाली आईटी सेल हर मोबाइल पर चेहरे को धूमिल और निखारने का काम तत्परता से करने लगती है.

जनता भी उन्हीं गुमराह करने वाली पोस्टों को पढ़ आगे शेयर करने का बीड़ा उठा लेती है और कुछ ही पलों में एक पोस्ट मच्छर मक्खियों की संख्या में पूरे देश भ्रमण पर देखी जा सकती है. राजनीतिक पहलुओं की पूर्ति तो हो जाती है लेकिन मूलभूत जरूरतों से दूरियां उतने समय के लिए जरूर बढ़ा दी जाती है. हम खुश होते हैं वह नेता छोटा हो गया वह बड़ा बन गया लेकिन उससे हमें क्या मिला देश के 136 करोड़ आबादी की जरूरत है उससे पूरी तो नहीं हो गई. आखिर आप कब तक ध्यान भटकाने वाले मुद्दों को चुनाव के समय झेलते रहेंगे. क्यों नहीं आप अपने मूल मुद्दों की तरफ अग्रसर होना चाहते आखिर क्या कारण है जो 5 वर्ष में आपको जो सबक मिलती है उसे आप दोबारा भूल जाते हैं.

5 साल जीत का और अपना विकास करने वाले नेता चुनाव आते ही निजी प्रहारों का ताना-बाना इस कदर तैयार कर गुमराह करने लगते हैं मानो जैसे हिंदुस्तान की जनता को कुछ पता ही नहीं. जिस देश में चुनौतियां इतनी बड़ी मुंह खोले दिख रही हो फिर भी जनता को किस की पड़ी, नेता तो अपने मुखारविंद का पूरा जोर दूसरे नेताओं के निजी आरोप प्रत्यारोप पर लगा, भला बुरा कह पीठ थपथपा लेने में विश्वास रखने लगे है लेकिन मूलभूत आवश्यकताएं और विकास तो इसके आगे नगण्य ही साबित हो रहा है.

देश की जनता भी 5 साल के बर्ताव भूल नेताओं की सहानुभूति में लग जाती है और सहानुभूति में अपनी आवश्यकताओं विकास बेरोजगारी गरीबी भूल अपने पावर का इस्तेमाल कर डालती है. लेकिन फिर अगले 5 साल सहानुभूति में दिए गए वोट से जनता त्रस्त ही नजर आती है. नेताओं के जुबान पर जनता दिखाने लगती है सहानुभूति. आखिर इसका हमारे जीवन पर कितना दुर्गामी परिणाम देखने को मिलता है इसकी कल्पना तो उस समय नहीं करते लेकिन देश और जनता कम से कम 10 साल पीछे जरूर चली जाती है.

चुनावी मौसम के 60 दिन नेता एक-दूसरे पर देश की जरूरतों की बात ना करते हुए सवाल और जवाब का समीकरण व्यक्तिगत जीवन पर ला खड़ी करते हैं. जिसकी वजह से जनता अपने नए पुराने प्रत्याशियों की भावनाओं में बहते हुए, वोट का इस्तेमाल कर चुनाव की व्यवस्था आवश्यकता मेनिफेस्टो और विकास जैसी मुद्दों को नजरअंदाज कर मताधिकार का प्रयोग कर डालते है और दिखने लगता है अगले 5 वर्ष फिर से परेशान रहने का सिस्टम.

आखिर इन बेबुनियादी बातों की आवश्यकता नेताओं को चुनाव और चुनावी माहौल बनाने में क्यों पड़ जाती है या तो वे अपने पिछले सालों में नाकामयाबी छुपाने की रास्तों पर कार्य करते हैं या देश की जनता खुद नहीं चाहती कि देश और प्रदेश में विकास हो. तो फिर जनता अपनी गलतियों को कितने समय लगाकर सुधरेगी. नेताओं के लिए भी आसान और सस्ता रास्ता मिल जाता है

भावनात्मक पहलुओं पर चुनाव लड़ना. किसी को नीचा दिखा कर खुद ऊंचा उठ जाना चुकी भारत का इतिहास ही सहानुभूतिऔ से परिपूर्ण रहा है. जिसके चलते आप हम गुमराह होते हैं और आगे भी होते रहेंगे ऐसा कसम खा बैठे हैं. लेकिन विकास व्यक्ति विशेष में छुप जा रहा तो इससे तो हमारा आने वाला कल परेशान हो जाएगा. 

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