बच्चों का फोन

बच्चों का फोन

बच्चों का फोन

लेखक मान सिंह नेगी 

 मिश्रा जी कहते हैं, क्या यह बात मिश्रा जी ही कहते हैं.

या सब जानते हैं, व्यक्ति हर किसी से जीत सकता है.

 लेकिन अपने बच्चों के आगे हार जाता है.

 वह बच्चों को कुछ कहना चाहता है, समझाना चाहता है.

परंतु मन मसोस के रह जाता है. क्योंकि वह अपने बच्चो के लिए ही जीता है.

 शायद यही वजह है. वह अपने बच्चों से प्राय हार जाता है.

 मिश्रा जी को याद है वह दिन जब उनका बेटा होटल प्रबंधक के तृतीय वर्ष के पढ़ाई कर रहा था.

 तब उसका फोन खराब हो गया लेकिन मिश्रा जी की भी नौकरी उस समय नहीं थी.

 जिसके कारण वह बच्चे को नया फोन नहीं दिला सकते थे.

 ना ही उनकी तनख्वाह इतनी ज्यादा थी.

 जिसके कारण उनकी बचत भी नहीं थी.

मिश्रा जी ने इतनी बार नौकरी  मे उतार-चढ़ाव देखा.

 जिसके कारण उनकी बचत भी अधिक नहीं थी.

 उन्हें रोज कुआं खोदना पड़ता  था. रोज पानी पीना होता था. 

 मिश्रा जी मरते क्या ना करते अपना फोन बच्चों को दे दिया.

 उसकी पढ़ाई में कोई बाधा ना आए यह सोचकर बच्चे ने भी मिश्रा जी की उम्मीदों को जिंदा रखा और उस पर खरा उतरा.

 आज मिश्रा जी खुश होते हैं.

 उसे काम पर जाते हुए देखकर लेकिन उनके दोनों बच्चों के पास फोन है.

मिश्रा जी कुछ समय के लिए बच्चों से फोन मांगते हैं.

 लेकिन दोनों में से किसी भी ने देने से मना कर दिया पूरा दिन बच्चे फोन खेलते हैं.

फिर चार्ज करते हैं फिर खेलते हैं.

 कभी छोटे बच्चे का दिल पसीज जाता है. 

वह कई दिनों में एक बार 10 मिनट के लिए अपना फोन मिश्रा जी को दे देता है.

 मिश्रा जी सोचते हैं बच्चों का फोन मांगना सही नहीं है.

लेकिन मजबूरी में बच्चों से फोन मांगना पड़ ही जाता है.

क्योंकि दफ्तर के कुछ जरूरी काम करने होते हैं.

मगर बच्चे किसी बात एवं परेशानी को नहीं समझते जबकि उन्हें समझना चाहिए घर की स्थिति क्या है? 

 एमएसएन विचार  घर के  हालात घर की परिस्थितियां को जो समझ लेता है.

उससे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं

इतिश्री

 

 

 

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