आत्महत्या या कायरता..........

आत्महत्या  या कायरता..........

आज के युवा के सहनशीलता का कुछ समझ नही आता है हाल ही घटना डॉक्टर वंदना शुक्ला ने अभी जल्दी ही सैफई स्थित मेडिकल कॉलेज में आत्महत्या कर ली..! अभी वो MD की पढ़ाई कर रही थीं और होस्टल के टाइप 2A ब्लॉक में रहती थीं। गाजियाबाद की रहने वाली थीं पिता जी क्षेत्रीय रूलिंग पार्टी के नेता भी हैं। अभी 25-26 साल की उम्र में इस बच्ची पर काम का कितना बोझ था और इसने जीवन से जुड़े कितने अनुभव बटोर लिए थे कि इसको जीने के लिए यह पृथ्वी सबसे अनुपयुक्त लगी.. परिवार और घर के खर्चों का कितना बोझ आ गया जो उसे वहन करना अत्यंत प्रगाढ़ हो गया था ..

ऐसा भी तो न रहक होगा कि बेरोजगारी में जवानी दम तोड़ रही थी .. लोगों के ताने सीना छलनी करते रहे हों.. या किसी व्यक्ति विशेष का जिंदगी में स्थान इतना बड़ा हो गया था कि रिश्तों में माँ बाप भी तुच्छ लगने लगें क्या किसी का न मिलना जीवन की आहुति दे देना है ? मानव तब जिंदा रह लेता है जब उसको अपनी इकलौती औलाद को कंधा देना पड़ जाय और दुःख तो केवल धूल हैं। और दिल टूटने से अगर लोग आत्महत्या ही करने लग जाते तो महामारियों से उतना जीवन न जाता जितना बिछड़ने से जाता। सवाल यह उठता है कि क्या हम अभिभावक के रूप में असफल हैं? दूसरी फ़ोटो देखिये और उस देवी स्वरूपा महिला की जिजीविषा देखिये ..

दम तोड़ने का विकल्प अगर होता तो सबसे आसान रास्ता उसके पास था कूद जाती जिधर मन होता हर तरफ मौत ही है। पर कोई खुद के लिए थोड़ी जीवित रहता है। उन भूख से छटपटा रहे नन्हे बच्चों को देखिये! कच्चा पक्का खाकर उन्होंने अपना बचपन व्यतीत कर दिया। उनको क्या पाया कि मैगी, वेजरोल, बर्गर, चाउमीन क्या होता है..? पर कभी देखा है किसी गरीब को आत्महत्या करते हुए ..!

उनसे पूछिये वो 200 कमाते हैं तो शाम तक 200 खर्च हो जाता है जिंदगी कर्ज में शुरू होता है और उसी में खत्म हो जाता है पर उनसे बड़ा दिलेर न देखा।और हर दिन इस उम्मीद से उठते हैं कि ईश्वर भूखे पेट जगाता सबको है पर कर्मठों को भूखे पेट सुलाता नही है।

समझने समझने के लिए बहुत कुछ है मगर समझे तो सही है वरना कायरत दिखानी है वो दिखाए......

आनंद वेदांती त्रिपाठी 

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