नमामि गंगे प्रोजेक्ट पर केंद्र से हाई कोर्ट ने जबाब मागा

नमामि गंगे प्रोजेक्ट पर केंद्र से हाई कोर्ट ने जबाब मागा

‌. नमामि गंगे प्रोजेक्ट की प्रगति पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब।

‌अगली सुनवाई 3 जनवरी को।
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‌स्वतंत्र प्रभात।
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‌प्रयागराज।

‌गंगा प्रदूषण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र की मोदी सरकार से नमामि गंगे प्रॉजेक्ट कार्य के प्रगति की जानकारी मांगी है।

लंबे अंतराल के बाद गंगा प्रदूषण को लेकर बैठी इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन जजों की पीठ ने केंद्र से पूछा है कि जितने भी एसटीपी स्थापित किए गए हैं, वे ठीक से कार्य कर रहे हैं या नहीं? उनकी क्या स्थिति है और गंगा में नाले का गंदा पानी सीधे कैसे जा रहा है?

उन्हें रोकने का इंतजाम क्यों नहीं किया गया है और गंगा में न्यूनतम जल प्रवाह रखने की सरकार की क्या योजना है?

‌गौरतलब है कि गंगा प्रदूषण मामले को लेकर दाखिल की गयी जनहित याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस गोविंद माथुर, जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा तथा जस्टिस अशोक कुमार की पीठ कर रही है, इसी की सुनवाई 6 दिसंबर को हुई थी, जिसमें कोर्ट ने केंद्र से यह सवाल पूछे। अब याचिका पर अगली सुनवाई 3 जनवरी को होगी।

केंद्र सरकार की तरफ से अधिवक्ता राजेश त्रिपाठी ने बताया कि नमामि गंगे प्रोजेक्ट की कार्रवाई हो रही है, इस पर अधिक जानकारी देने के लिए उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट से और समय मांगा।

‌भाजपा के तमाम नेता गंगा खासकर नमामि गंगा के नाम पर वोटबैंक की राजनीति करते रहे हैं, मगर नमामि गंगे प्रोजेक्ट पर मोदी सरकार कितनी गम्भीर है इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि हाईकोर्ट की पीठ ने इस संबंध में जब केंद्र की मोदी सरकार से कार्य योजना की जानकारी मांगी तो वह अभी तक कोई जानकारी उपलब्ध नहीं करा पायी है।

राज्य की योगी सरकार से भी गंगा में गिर रहे नालों और एसटीपी के संचालन के संबंध में जवाबी हलफनामे कोर्ट की तरफ से मांगे गए थे।

‌सुनवाई के दौरान न्यायमित्र अरुण कुमार गुप्ता ने जजों की खंडपीठ को बताया​ कि गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए न्यूनतम 50 फीसदी पानी बनाए रखने की जरूरत है। उसका भी जवाब दाखिल नहीं किया गया है। गंगा में एसटीपी से शुद्ध हुए पानी में बायोकेमिकल पॉलिफॉर्म गंगा जल में मिलकर प्रदूषण फैला रहा है। ट्रीटेड पानी को गंगा में न गिराकर अन्यत्र ले जाया जाए।

‌गौरतलब है कि इलाहाबाद में 6 एसटीपी स्थापित हैं, जो ठीक से काम नहीं कर रहे। 83 नालों में से 43 नाले सीधे गंगा में प्रवाहित हो रहे हैं। कानपुर में चमड़ा उद्योगों को स्थानांतरित करने के मामले में भी कोई कार्रवाई नहीं की गई है और चर्म उद्योगों का गंदा पानी सीधे गंगा जी में आ रहा है। न्यायमित्र का कहना था कि ट्रीटमेंट के बाद भी पानी गंगा में प्रदूषण बढ़ाने का कारण है, जिस पर कोर्ट ने उनसे विशेषज्ञों की सूची मांगी, जो जांच करेंगे कि गंगा में जा रहा ट्रीटेड पानी क्या प्रदूषित है और उसे अन्य उपयोग में लाया जा सकता है।

‌एके गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट ने प्रदूषित शोधित पानी को गंगा के उस पार अन्य कामों में लिए जाने की योजना तैयार करने को कहा था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इलाहाबाद में ही बन रही ओमेक्स सिटी की तरफ से कहा गया कि सिटी लगभग बनकर तैयार है, लेकिन बिना किसी वैज्ञानिक आधार के 28 मार्च 2011 और 22 अप्रैल 2011 को गंगा के उच्चतम बाढ़ बिंदु से 500 मीटर के भीतर किसी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी गई है।

‌कोर्ट ने इस मुद्दे पर अगली तिथि को विचार करने को कहा है। याचिका पर यमुना में प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया गया। कहा गया कि हथिनी कुंड बैराज से पानी यमुना में नहीं आ रहा है। इसके बाद यमुना मे पानी नहीं रहता। दिल्ली के शाहदरा नाले और चंबल, बेतवा नदियों का ही पानी यमुना में आ रहा है। यमुना को शोधित किए बगैर गंगा को साफ रखने की कल्पना बेमानी है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर भी अगली तिथि पर विचार करने को कहा है।

‌राज्य सरकार के अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता शशांक शेखर सिंह ने सुनवाई के दौरान जजों की बैंच को बताया कि गंगा में एटीपी से जो शोधित पानी डाला जा रहा है, वह पूरी तरह से शुद्ध है, उससे किसी तरह का प्रदूषण नहीं फैल रहा है। सरकार कोशिश कर रही है कि सभी नालों को एसटीपी में शोध करने के बाद ही गंगा में डाला जाए।

‌सुनवाई में जजों की बैंच ने प्रयागराज के आसपास शवदाह स्थलों के संख्या की जानकारी भी मांगी और पूछा है कि शवदाह स्थलों की निगरानी और देखरेख कौन कर रहा है।

‌प्रयागराज दया शंकर त्रिपाठी की रिपोर्ट।

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