पुलिस की जुबानी पुलिस की कहानी

पुलिस की जुबानी पुलिस की कहानी

रिपोर्टर-विकास कुमार अस्थाना

पुलिस की जुबानी पुलिस की कहानी।

अयोध्या।

आजकल समाज का वातावरण इतना गन्दा हो गया है की इसकी सफाई हेतु हमें सफाई कर्मियों की जरूरत होती है जो की समाज के वातावरण को स्वच्छ व स्वस्थ रख सके वातावरण का अर्थ समाज मे फ़ैल रही गन्दगी से है गन्दगी दो प्रकार की होती है

एक वो जो हम स्वंय कूड़े करकट व अन्य प्रकार की गन्दगी से समाज के वातावरण को दूषित करते हैं व दूसरा वो जो की हमारी मानसिकता पर निर्भर है अगर हमारी गन्दी सोच व हमारी गन्दी मानसिकता होगी तो हम हर किसी कॊ द्रेष की भावना से देखते हैं और शायद इसी द्रेष भावना व अपनी गन्दी सोच के बदौलत हम कोई अपराध कर देते हैं और आज़ के समय मे अपराध करना सड़क पड़ कूड़ा करकट फेंकने के समान हो गया है इसी अपराध कॊ खत्म करने के लिये व न्यायपालिका कॊ सही व सुचारू रुप से चलाने के लिये पुलिस का गठन किया गया है

जो हमारी गंदी मानसिकता द्वारा फैलाई गयी गन्दगी व अपराध कॊ साफ व खत्म करने का काम करती है हम सभी कई संगठनों के नियमों व कार्यो से अनजान होते हैं जिसकी जानकरी शायद हमें नहीं होती है और हम उस संगठन के कार्यकर्ता कॊ दोषी मानते हैं ऐसा नहीं है की सभी संगठन व कार्यकर्ता पाक साफ होते हैं बस यही कहावत है की आटे के साथ घुन भी पिसता है इसी श्रेणी मे पुलिस भी एक ऐसा विभाग है ऐसी संस्था है जहाँ पर पुलिसकर्मी अपनी जान की बाजी तक लगा देते हैं

वास्तविकता मे खतरों के खिलाड़ी सेना के जवान व पुलिस के जवान ही होते हैं फर्क सिर्फ यही होता है की सेना का जवान बार्डर पर दूसरे देशों के दुश्मनों से हमारी रक्षा करते हैं और पुलिस हमारे देश के अन्दर हमारे राज्य के अन्दर हमारे शहर के अन्दर के दुश्मनों से हमारी रक्षा करती है और हमारी सहायता करती है इसी तर्ज पर एक दिन मै कार्यवश अपने शहर से दुसरे शहर अपने वाहन से जा रहा था तभी रास्ते मे मुझे एक पुलिस वर्दी मे सड़क पर खड़े किसी चौकी के दरोगा साहब दिखे और उन्होंने मुझसे लिफ्ट मांगने का ईशारा किया

मैंने उन्हें अपने वाहन मे बैठा लिया और अपने गन्तव्य की ओर रवाना हो गये रास्ते मे उन्होंने अपने तीन वर्ष के कार्यकाल मे अपने अनुभवों कॊ हमारे साथ साझा किया बातचीत के दौरान मैंने भी पुलिसिया प्रणाली कॊ लेकर उनसे कई सवाल पूछे और उन्होंने नाम ना छापने की शर्त पर बेबाकी से सारे सवालों का जवाब दिया ऐसा प्रतीत हो रहा था की मानो तीन वर्ष नहीं बल्कि कई वर्ष विभाग मे गुजार चूके हो चूँकि शहर के तहसील मे उनकि पोस्टिंग है

इसलिये प्रायः वो शहर रिपोर्टिग के लिये जाया करते हैं मैंने उनसे सवाल किया की पुलिस कॊ लोग शत्रु क्यूँ मानते हैं? उन्होंने जवाब दिया हमारे देश मे हमारे राज्य मे हमारे शहर मे हर जगह राजनिति हावी है और अफसरशाही राजनिति के आगे घुटने टेक देती है क्यूँकि सर्वप्रथम अफसरशाही अपनी नौकरी कॊ प्रथम वरीयता देता है और हम जो की समाज मे हो रहे अपराधो का सामना करते हैं ना की फैसला सुनाते हैं और वादी प्रतिवादी हमसे फैसला सुनने कॊ इच्छुक रहते हैं

जो की संभव नहीं होता है इस कारण वादी प्रतिवादी के लिये हम शत्रु हैं दूसरा अफसरशाही और राजनीतिज्ञों का किसी अपराध के प्रति चाहे वो छोटा हो या बड़ा हमारे पास उसके बचाव हेतु दवाब पड़ता है सभी के लिये नहीं, इस कारण विपक्षी पार्टियो की नज़र मे हम शत्रु बन जाते हैं कुछ पुलिसिया व्यवहार के कारण लोग हमे शत्रु मानते है अगला सवाल मैंने पूछा जनता की नज़र मे पुलिस भ्रष्ट है ऐसा क्यूँ? उन्होंने जवाब दिया इसका कारण हमारा सरकारी तन्त्र है हमारा जो मानदेय व कुछ सुविधाएं जो सरकार द्वारा निर्धरित है

शायद उससे कहीं ज्यादा हमारे ऊपर विभाग के ऊपर खर्च का बोझ आ जाता है जिसे वहन करने मे हम सक्षम नहीं होते हैं जिसे कम करने के लिये हमें दुसरे तरीक़े से धन अर्जित कर अपने कार्यो का निर्वहन करना पड़ता है आज़ अगर कोई हादसा होता है और हादसें मे कोई लावारिस लाश होती है तो हमें स्वंय अपने पैसे से किसी वाहन द्वारा लाश कॊ अस्पताल या अन्य जगहों तक पहुंचाना पड़ता हैं जबकि विभाग के पास ऐसे कार्यों के लिये गाड़ी उपलब्ध होती है

लेकिन विभाग द्वारा समय पर गाड़ी ना भेजना,गाड़ी खराब होने का हवाला देना',ड्राइवर की तबियत खराब हो जाना अन्य बहाना करना आदि कारण होते हैं अधिकांश ऐसे मौकों पर विभाग की लापरवाही की वजह से इसका वहन हमें करना पड़ता है अगर शिकायत करो तो विभाग की बात आ जाती है वर्ष मे हमें दो वर्दी की जरूरत होती है एक बार एक वर्दी का खर्चा लगभग तीन से चार हजार रुपये आता है औऱ सरकार द्वारा हमें तीन साल बाद केवल लगभग साढ़े सात हजार रूपए दिया जाता है

लगभग अठारह से चौबीस हजार रूपए के खर्चों के एवज मे हमें केवल साढ़े सात हजार ही प्रप्त होता है बाकी पैसे हमें अपने जेब से लगाना पड़ता है इसी प्रकाार जूते व अन्य आफिस स्टेशनरी के लिये भी अपने जेब से पैसा लगाना पड़ता है सरकार द्वारा हमें सरकारी आवास की व्यवस्था है लेकीन उसके बाद भी सरकारी आवास उपलब्ध ना होने के कारण हमें किराए पर आवास लेना पड़ता है इसी प्रकार सरकारी वाहन मे ईंधन के लिये सरकार द्वारा कुछ रूपए ही निर्धारित है

जबकि उससे ज्यादा हमारा खर्चा हो जाता है अब पुलिस इन सबके लिये कहाँ से धन की व्यवस्था करेगा इसलिये हम धन अर्जित करने के लिये दूसरा माध्यम अपनाते हैं इसलिये हमें लोग भ्रष्ट कहते हैं लेकीन कुछ पुलिसवालो ने इसकी आड़ मे दूसरे माध्यम से धन अर्जित करना अपना शौक बना लिया है जो की वास्तव मे ग़लत है और ऐसे लोग भ्रष्ट होते हैं किसकी वजह से सभी पुलिसवाले बदनाम हैं। हमनें पूछा पुलिस निर्दयी क्यूँ होती है?

दरोगा साहब का जवाब था की देश मे कहीं पर भी कोइ भी घटन होती है तो सबसे पहले हम पहुंचकर उसका मुआयना करते हैं एंव आगे की कार्यवाई की रणनीति बनाते हैं इस प्रकार के लगातार हादसों से हमारा दिल व दिमाग़ इतना मजबूत हो जाता है की हमें किसी हादसे से कोई डर नहीं लगता विक्षिप्त लाशों कॊ हम पुलिसवाले ही बटोरते हैं क्या कोई परिवार का सदस्य व अन्य व्यक्ति ऐसा कर सकते हैं नहीं,जो लोग लाश कॊ छूने के बाद ख़ुद नहाते हैं व अपने कपड़ो कॊ साफ कर पहनते हैं

लेकीन हम लोग बिल्कुल इसके विपरीत हैं अगर दिन मे हम कई बार नहायेंगे कई बार कपड़ो कॊ धोएंगे तो हमें कार्य करने का वक्त ही नही मिलेगा इसलिये हम किसी प्रकार के छुआछूत व ढकोशलों कॊ नही मानते हैं अपराधों कॊ देखते -देखते हमारे आंखो के आँसू सूख चूके होते हैं। कई बार अपराधियो से सजा कबूल करवाने के लिये हमें सजा के तौर पर डंडे से पिटाई भी करनी होती है तो हम करते हैं क्यूँकि ये हमारे विभाग का वसूल है इसलिये हम लोगों की नज़र मे निर्दयी होते है।

फ़िर हमने पूछा की पुलिस के अन्दर अहम क्यूँ होता है? दरोगा जी ने कहा की अहम हमारे अन्दर नही होता है बल्की ख़ाकी वर्दी पहनने के बाद कुछ पुलिसवाले अपनी इंसानियत खो बैठते हैं औऱ वो सोचते हैं की वर्दी हमारा हथियार है इसलिये हम किसी के सामने झुकेंगे नहीं बल्की लोगों कॊ झुकायेंगे हमारे पास चार प्रकार के हथियार होते हैं पहला वर्दी का खौफ दूसरा हमारा डंडा तीसरा हमारी बन्दूक औऱ चौथा कानून का डर यानी अपनी कलम से किसी कॊ भी किसी भी धारा मे फंसाकर उसकी जिन्दगी गर्त मे धकेलना

अब जिसके पास इतने हथियार होंगें क्या उनके अन्दर अहम नहीं आयेगा लेकीन ऐसा सब नहीं करते बल्की कुछ पुलिसवाले ही होते हैं और जिनके कारण पुलिस विभाग व अन्य पुलिसकर्मी बदनाम हैं औऱ लोग हमें इन्ही ग़लत नजरों से देखते हैं। मेरा अगला सवाल था की पुलिस निर्दोषों कॊ क्यूँ फंसाती है? उन्होंने कहा ऐसे पुलिसकर्मी जिनके अन्दर लालच कूट-कूट कर भरा होता है

औऱ कम समय मे ज्यादा कमाने की ईच्छा रखते हैं इसलिये वो निर्दोषों कॊ फंसाकर धन ऐंठने की कोशिश करते हैं एंव दुसरे के प्रति द्रेष की भावना और किसी ताकतवर या विपक्षी पार्टी का दवाब होना है।

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